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05.03.2012
 
बबुआ
शबनम शर्मा

अम्मा रोज उठती
बुहारती घर-आँगन,
नहा धोकर पूजा करती,
फिर बैठ जाती घर के सामने,
मंजा बिछाकर,
आते-जाते उसे सब दुआ-सलाम करते
हँसकर जवाब देती सब बातों का,
कभी-कभी बताती
आने वाला मौसम, मेहमान और बुरा वक्त,
बाटती सेमियाँ, गाती गीत
सिर से ओढ़नी खिसकने न देती
सदैव मुस्कराती,
पर न जाने क्यूँ,
वो जब कभी भी जाती
सडक के उस पार
और सुनती बूटों की आवाज
या कभी गलती से देख लेती
दूरदर्शन पर चलते सैनिक
तो रोक नहीं पाती खुद को
कई-कई दिन अपने
मलमली दुप्पटे से पोंछती
अपनी आँखें और इन्तज़ार सा
करती किसी अनजान शख़्स का।
बुदबुदाती, बबुआ कब आओगे?


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