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03.16.2014


बाबूजी

सारी उमर चौकीदारी करके गुज़र गई। धनिया और उसकी बीवी मिल-जुलकर गृहस्थी चलाते रहे। बच्चों को पढ़ाने के लिये खेती वाली ज़मीन बेच डाली। बड़े बेटे को पढ़ा-लिखाकर लैक्चरार बना दिया। वह शहर में रहने लगा। उसने अपनी अच्छी-खासी कोठी बनवाई। गृहप्रवेश पर अपने मित्रों को निमत्रंण दिया। अपने भाई को भी बुलाया। पिताजी को पता चला तो वो भी साथ चलने को तैयार हो गये। भाई के साथ बाबूजी को देखकर बेटे-बहू का उत्साह ठंडा सा पड़ गया। फिर भी अनमने मन से उन्हें पीछे वाला कमरा दे दिया गया।

हम भी पार्टी में मौजूद थे। नाच-गाना, केक कटना, फिर शराब व अच्छा खाना सबको लुभा रहा था। अपनी आदत अनुसार मैं घर में घूमने निकली। परदे की ओट से किसी बुजुर्ग को पीतल के स्टोव से जूझते देखा। दाल पक नहीं पा रही थी, हाथ में 3-4 दोपहर की रोटियाँ दाल में उतरने को तैयार न थी, कि मैंने पूछा, "बाबा, कब से काम कर रहे हो इनके पास, रुको मैं तुम्हें खाना लाकर देती हूँ।"

"मैं इनके घर काम नहीं करता, मैं तुम्हारे साहब का बाबा हूँ, मकान देखने आ गया, गलती हो गई। बहु ने ये कमरा दिया है, कहा कि पार्टी में किसी को मुँह मत दिखाना, लोग क्या सोचेंगे, फटे कपडे़, बूढ़ा शरीर, बीमार आवाज़, उनके रुतबे में फ़र्क आ जायेगा। बेटी ग्यारह बज चुके होंगे, भूख लगी थी सो दाल पका रहा था, ये शोर तो न जाने कब खत्म होगा, बहू को रोटी देनी ख्याल भी रहेगी या नहीं।" कहते-कहते उनके हाथ रोटियाँ दाल के पानी में छोड़ चुके थे।

"बेटी, मुझे कहाँ पचता है इस उमर में भारी खाना, रहने दो, बहू गुस्सा करेगी, पेट ही तो भरना है।"

मेरे कदम कितने भारी हो गये थे सोच के कि ये वही बाबूजी हैं जिनकी कुरबानी की मिसालें सुनाते साहब नहीं थकते।


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