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05.03.2012
 
अटूट सत्य
शबनम शर्मा

क्या तुमने मुझे,
 सच में नहीं देखा,
  फिर कैसे महसूस की
   मेरी सिसकियाँ,
    दर्द का उतार-चढ़ाव,
      क्यों हो गये मुझ संग
       तुम भी उदास, क्यों लम्बी
         लम्बी साँसों का आदान-प्रदान
           कर बैठे सिर्फ बातों ही बातों में,
             क्यों किया हर पल तुम्हारी भोली
                भावनाओं ने मेरा बेसब्री से
                  इन्तज़ार, क्यों बड़बड़ाये तुम
               सोते हुए भी, क्यों महसूस किया
            सपंदन तुम्हारे सम्पूर्ण शरीर ने,
         जो पाना चाहता सदैव मेरा स्पर्श,
      फिर वक्त व स्वार्थ की, कौन
   सी लहर ने मुझे सौंपना चाहा
    किसी और को, और तुम
     अनायास ही कह उठे,
      "तुमने मुझे कौन सा देखा है",
           क्या ये छल है या अटूट
             सत्य कि मैंने तुम्हें देखा नहीं
               परन्तु महसूस किया तुम्हें, मेरे हो
                  मेरे रहोगे, ज़िन्दगी के क्षण भंगुर होने तक।



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