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नीलम के ब्याह को चार बरस बीत गये थे। हर वक्त सबकी खोजी नजरें उसे परेशान
करती रहती थीं। घर में सास,
ननदें,
पति सभी को एक बच्चे की इच्छा थी,
जो नीलम पूरी न कर पा रही थी। आखिर एक फैसला लिया गया कि बच्चा गोद ले लिया
जाये। अनाथालय से बेटी ले ली गई। रिश्तेदारों को निमंत्रण भेजे गये,
बड़ी धूम-धाम से नामकरण किया गया। घर में रौनक आ गई। बच्ची की किस्मत ही बदल
गई। हर वक्त किसी न किसी की गोद,
सुन्दर तोहफे सब कुछ नन्हीं को मिलता। समय का पलटा,
नीलम की तबीयत खराब हुई,
डाक्टर ने बताया वो माँ बनने वाली है,
नन्हीं के आते ही ये शुभ खबर,
नन्हीं का लाड़ और परवान चढ़ गया। बेटा हुआ। घर में खुशियाँ भर गईं। पर
नन्हीं,
छोटे भाई के आते ही बड़ी दिखने लगी। नीलम का सारा ध्यान,
प्यार बेटे पर आकर्षित हो गया। घर के दूसरे लोग भी पोते को पाकर निहाल थे।
समय के साथ-साथ दोनों बड़े हुए। नन्हीं सरकारी स्कूल में पढ़ी व भाई
कान्वेन्ट में। नन्हीं सबका भरपूर ध्यान रखती,
खासकर अपने भाई का। परन्तु परिवार में कुछ उसे सदैव ही खटकता रहता। उसकी हर
चीज अब सब पर बोझ बन गई थी। घर के काम का दायित्व उस पर बढ़ता ही जा रहा था
जबकि भाई को एक शहजादे सी परवरिश मिल रही थी। घर में भाई का जन्मदिन था मैं
भी निमंत्रित थी। अच्छा खासा इन्तजाम किया गया। नन्हीं भाग-भागकर काम कर
रही थी,
कि उसके हाथ लगने से केक के पास रखा फूलदान टूट गया। भाई ने आव देखा न ताव,
नन्हीं के जोरदार तमाचा
जड़
दिया। नन्हीं रो पड़ी। उसने भी भाई को धक्का दे दिया कि नीलम बिफर सी गई व
खींचती सी नन्हीं को अन्दर के कमरे में ले गई। आवाज साफ थी,
"तेरी
इतनी हिम्मत,
अनाथालय की लड़की,
तुझे हमने घर दिया,
नाम दिया,
मेरे बेटे पर हाथ उठाती है।"
मैं शून्य में ताकती रह गई,
सोचती,
नन्हीं क्या अब अनाथ नहीं है,
अनाथालय में नहीं रहती।
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