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05.03.2012
 
अकेलापन
शबनम शर्मा

आज घर जाते
मेरे कदम
तेज़ नहीं होते,
दो आँखें मुझे नहीं
निहारतीं,
कोई भी हाथ से
थैला ले नन्हें हाथों
से लिफ़ाफे नहीं टटोलता
न कोई रूठता, न मनाता

दीवारें मुँह चिढ़ातीं,
घड़ी की सुइयाँ धीमी
गति की हो गई लगतीं।
कई बार लेकर बैठती
बीते बरसों की फिल्म,
तो कई डायलॉग माँ,
अम्मा, सुनती हो, उभर
से जाते, फिल्म में,

टटोलती खुद को,
पाती सिर्फ़ इक खोखला
व्यक्तित्व, जो सबके
लिये जिया, परन्तु खो
दिया खुद को, आज
नौबत की बात ही नहीं है,
नाम ही नहीं है,
पहचान ही नहीं है।


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