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09.01.2014


कसौटी

हस्पताल के चारों ओर भीड़ थी। शहर में भी जितने मुँह उतनी बातें। अजय अपने माँ-बाप का इकलौता पुत्र था, 4 बहनें थी, 2 अजय से बड़ी और 2 छोटी। उसने आत्महत्या कर ली थी। माँ ने सुबह उसे नाश्ता दिया, पिता ने उससे बातचीत भी की थी ड्यूटी पर जाने से पहले। पर क्या बात थी जो उसे इतने बड़े निर्णय पर ले आई थी। पोस्टमार्टम हो रहा था। रिर्पोट आई, लाश घर के लिये दे दी गई। सबकी समझ से बाहर था कि क्या हुआ?

अजय अच्छा लड़का था। सदैव हँसमुख, मेहनती, परन्तु कभी-कभी वो अपना कमरा बंद करके बैठ जाता था। लाश को जलाने के बाद सब घर आए। उसकी एक-एक चीज़ की छानबीन की गई। उसकी पीली कमीज़ जो उसने कल रात पहनी थी, में से एक पत्र निकला, जिसमें लिखा था "पिताजी मैं आपकी इच्छा पूरी नहीं कर सकता, आप मुझे आई.एस. अफ़सर बनाना चाहते थे, मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, मैं एक अध्यापक बनना चाहता हूँ, आप ये बात सुनना भी नहीं चाहते, आपने मुझे इसे पूरा करने के लिए बहुत कोशिश की, परन्तु मैं आपका ये सपना पूरा न कर सकूँगा। अच्छा, पापा मुझे माफ़ कर देना, सोचता हूँ अगले जन्म में आपका बेटा बनूँ और आपकी कसौटी पर खरा उतरूँ। आपका बेटा अजय।"


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