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ISSN 2292-9754

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10.16.2014


वे दरख़्त

उन दरख़्तों का तिलिस्मी साया
जकड़ लेता है अपनी छाँव तले
भर देता है अहसास
सुस्ताने का कुछ पल ठिठक जाने का
बिछा देता है नर्म मुलायम कोमल पत्तियाँ
प्रेम की सलाखों पर चले पाँवों के नीचे
उसूल गुरूर को तोड़कर
काल्पनिक स्वप्निल हयात में विचरते हुए
दुआओं को उठ जाते हैं हाथ
उनकी सलामती को
संतुष्टि को ख़ुशहाली को!!


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