अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
11.06.2014


वसंत मेरे भीतर उतर आया है

कोयल की कूक सा कुहुँकता हुआ वसंत
मेरे मन के भीतर उतर आया है
जबसे तुम्‍हारे होने के अहसास ने
मेरे आसपास पड़ाव बना लिया है
शहद सा झड़ता है मेरी आँखों से
कच्‍चे टेसू के रंग से मेरी हथेलियाँ रंग गयी हैं
पीले फूलों सी तितली तुम्‍हारी स्‍मृतियाँ सहेजे मंडरा रही है
सौंधी सी ख़ुशबू मेरे मन की धरा पर बिखर गई है
उमंगों के कचनार खिल उठे हैं
मेरा दिल धड़कते हुए मचल उठा है
तुम बदलते मौसम की तरह
चुपचाप मेरे मन की बगिया में आकर ठिठक गये हो
मुझमें ही उलझते हुए से
तुम्‍हारे आते ही मन में सारे मौसम
रंग बिखेरने लगे हैं
यह पीला वसंत और भी वासंती हो गया है
सपने में भी, पल भर को, तुमसे दूर जाने का अहसास
मेरी पलकों को गीली कर देता है
और ढुलकने लगता है गालों पर
हे बहती हुई पुरवाई! ज़रा ध्‍यान से सुन ले
मैं उस नेह की डोर से बँधी मुस्‍कुरा उठी हूँ तो
तुम ज़रा हौले से चलो
कहीं ज़माने की नज़र न लग जाये
पीले फूलों सा खिलता वसंत
अब हर मौसम में
मुझ में ही मिल जायेगा
क्‍योंकि वसंत मेरे मन के भीतर उतर आया है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें