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ISSN 2292-9754

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10.31.2014


पर नहीं थे तुम

होना तुम्हारा मेरे जीवन में
एक गुदगुदाता मीठा अहसास
हरदम आसपास
समय बदला
वह अहसास भी बदला
एक घुटन भरी पीड़ा में
तुम्हारा होना भी,
न होना, बन गया था मेरे अस्तित्व में
लगता, मैं छली गयी, मैं ठगी गयी!!

जब जग जाती रात को गहरी नींद से
उस वक्त मेरे नयन रेगिस्तान की तपती रेत की मानिंद
दहक उठते
तब मैं तुम्हारे शीतल स्पर्श को पाना चाहती
पर नहीं होते तुम!!

उस वक्त बहती हुई मेरे पलकों के कोरों पर
अनगिनत आँसुओं की धार को
तुम्हारे भागीरथ बन जाने की ज़रुरत होती है
ताकि मुझ गंगोत्री को
अपने अन्तास्थल में समा लो
पर नहीं होते तुम!!

वक्त के भयंकर तुफ़ानों के बीच
जब मैं अकेले लड़खड़ा जाती हूँ, संघर्षों से घबरा जाती हूँ
तब ज़रूरत होती है मेरे माथे को
तुम्हारे मजबूत कन्धों की
पर नहीं होते तुम!!

जलती हुई आग के सामान इस विरह में
मेरे महकते बदन को
तुम्हारे भुजपाश की ज़रूरत होती है
पर नहीं होते तुम!!

मुझे ज़रूरत होती है तुम्हारे सर्वांग की
मैं अहिल्या, तेरे रामनामी स्पर्श से तर जाऊँ
पर नहीं होते तुम!!

क्यों? आखिर क्यों??
क्यों नहीं हम साथ हैं?
साथ साथ पूरी दुनियाँ को देखने का वादा
अब सपना बन, मेरी हथेली की बंद मुठ्ठी से
रेत की तरह सरक रहा है
तुम्हारा होकर भी न होना, मेरे जीवन को छल रहा है
तो अब लौट आओ ......
नज़र उतारें अपने प्यार की
और जी लें वही प्यारे पल!!!!


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