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ISSN 2292-9754

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03.23.2016


मन को छू जाये

न जाने कब क्या मन को छू जाये
तन मन को पुलकित कर जाये
रोम रोम में समा जाये सिहरन
होठों पर स्मित रेखा खिंच जाए
हवाओं में हो कुछ नया सा सुरूर
मौसम बदला बदला नज़र आये
चिड़ियों के चहकने से बज उठे जलतरंग
मन का मयूर नाच नाच जाये
सागर की धीरता हो जाये उच्छृंखल
मन नदिया बन उफना उफना आये
बिजली चमके बादल गरज कर बरसे
मन की धरा भी अंकुरा आये
फुहारों से भिगो कर तन मन
सीधे तुम दिल में उतर आये
न जाने कब क्या मन को छू जाये
तुम्हारा प्यार ही जीने का भ्रम बन जाए
जीने का भ्रम बन जाए!!


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