अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.20.2018


इतना प्यारा

कोई क्यों इतना प्यारा लगता है
अपनी जान से भी ज़्यादा
क्यों मन में समा जाता है
जैसे सागर में नदी
और झरने नदियों में
पर्वत शृंखलायें सर उठाए खड़ी हैं
पेड़ों की शाखों पर चिड़ियों ने
घोंसले बना लिए हैं
मन्दिर में प्रार्थनाएँ होने लगीं हैं
घंटों की धुन के साथ आरती हो रही है
ये मन क्यों डोल उठा
उसकी डाँट में भी प्यार नज़र आने लगा
हर बात में हर जगह
तेरी छवि है
मुस्कुराती हुई
बोलती हुई सुनती हुई
मन में तरंगित होती हैं ध्वनियाँ
चाँद भी निकल आया है
देखो ये तुम हो
पर चाँदनी इसे साथ क्यों लाये
ये क्यों है तुम्हारे साथ
जाओ इससे अच्छा तो तुम
बादलों की ओट में छिप जाओ
मैं इंतज़ार कर लूँगी तुम्हारा
झेल लूँगी विरह, तड़प
उसमें तुम मेरे साथ तो होगे
जहाँ होंगे सिर्फ़ हम और तुम साथ साथ!!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें