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ISSN 2292-9754

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07.27.2014


दुनिया

वह दुनिया जिसे मै देखना चाहती हूँ
जानना, समझना चाहती हूँ
उसकी भौगोलिक परिस्थितियों को
उसके गूढ़ रहस्यों को
गुफा के एक छोर से दूसरे तक
पहाड़ की चोटी पर उगे उस वृक्ष को
या तराई में बहती नदी को
नदी पर बने बांधों को
उसकी छाती पर बने पुलों को
समुन्द्र में उठती लहरों को
या उसमें उठते ज्वार भाटे को
पृथ्वी की हरितमा को
बर्फ से आच्छादित हिम चोटियों को
धरती की गोलाई को
कंक्रीट के जंगलों को
मासूम बच्चों की किलकारियों को
लाठी टेकते वृद्धों को
उनकी मानसिकता को,
उनकी भावनाओं को
बनते बिगड़ते रिश्तों को
युवा मन के सपनों को
साहित्यकार की कलम से निकले शब्दों को
अपनी बेचैनी को
मन में उठते बवंडर को
भीतर उठती दावानल जैसी अग्नि को
शांत कर लेना चाहती हूँ
तुम्हारी जानी परखी नज़रों से
परिपक्व विचारों से
जान समझ कर
इस दुनिया में चंद रोज़ चैन से
जी लेना चाहती हूँ!!


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