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ISSN 2292-9754

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07.27.2014


बात नदी से

आज एक नदी से मुलाकात हो गयी
मैं जानने को उत्‍सुक हो गयी
कि तुम कैसे निरन्‍तरता बनाये रखती हो
न कभी थकती हो
न कभी विश्राम
घाट किनारे सब सो जाते हैं
पर तुम नहीं सोती
शान्‍त, निश्‍चल, निर्बाध
बहती रहती हो
अपनी ही गति से
मेरी बात सुन नदी हौले से मुस्‍काई
और अपनी गति में तनिक भी व्यवधान न डाल बोली----

मैं भी बिचलित होती हूँ
मुझ में भी उथल पुथल मच जाती है
जब कोई मनचला खिलंदणा
एक पत्‍थर उछाल देता है मेरी ओर
और हलचल मचा देता है
मेरी शांत धारा में
तो कुछ पलों को भावनाओं के ज्वार में बहने लगती हूँ
फिर उस पत्‍थर को अपनी मज़बूती बना
दुगुने प्रवाह से बह उठती हूँ
अपनी मंज़िल की ओर
क्‍योंकि रुकना या थमना मैंने नहीं सीखा
मैं तो नदी हूँ
मेरा काम है बहना
निरंतरता और सम गति
कुछेक पल मैं बेशक थम जाती हूँ
तो उन पलों में मैं कुछ और
मज़बूत हो जाती हूँ
नदी की बातें सुन मैं सब जान और
समझ गयी थी
रुकना या थमना जिंदगी नहीं!


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