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ISSN 2292-9754

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11.06.2014


बाबरे मन

बाबरे मन तू ठहर ज़रा
अम्बर सा सूना होता क्यों
तू देख ज़रा जग की माया
फल, फूल और घने जंगल
समझ ज़रा नदियों को तू
सागर सा उफनाता क्यों
राही बन क्यों भटक रहा
जगी कौन सी प्यास तुझे मन
मंदिर, मस्जिद पर टेक कर माथा
फसा है ऐसे मोहजाल में क्यों
देता कौन तुझे आमंत्रण
मादक नयनोँ के भ्रमजाल में तू
ऐसे गिरा है जैसे टूटी शाखा
वहाँ पर नीड़ बनाया क्यों!!


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