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05.03.2008
 

चाँद पे होता घर जो मेरा
सीमा सचदेव


चाँद पे होता घर जो मेरा
रोज़ लगाती में दुनिया का फेरा

चंदा मामा के संग हँसती
आसमान में ख़ूब मचलती

ऊपर से धरती को देखती
तारों के संग रोज़ खेलती

देखती नभ में पक्षी उड़ते
सुंदर घन अंबार में उमड़ते

बादल से मैं पानी पीती
तारों के संग भोजन करती

टीमटिमाते सुंदर तारे
लगते कितने प्यारे-प्यारे

कभी-कभी धरती पर आती
मीठे -मीठे फल ले जाती

चंदा मामा को भी खिलाती
अपने ऊपर में इतराती

जब अंबर में बादल छाते
उमड़-घुमड़ कर घिर-घिर आते

धरती पर जब वर्षा करते
उसे देखती हँसते-हँसते

में परियों सी सुंदर होती
हँसती रहती कभी न रोती

लाखों खिलौने मेरे सितारे
होते जो हैं नभ में सारे

धरती पर मैं जब भी आती
अपने खिलौने संग ले आती

नन्हे बच्चों को दे देती
कॉपी और पेंसिल ले लेती

पढ़ती उनसे क ख ग
कर देती मामा को भी दंग

चंदा को भी में सिखलाती
आसमान में सबको पढ़ाती

बढ़ते कम होते मामा को
समझाती मैं रोज़ शाम को

बढ़ना कम होना नहीं अच्छा
रखो एक ही रूप हमेशा

धरती पर से लोग जो जाते
जो मुझसे वह मिलने आते

चाँद नगर की सैर कराती
उनको अपने घर ले जाती

ऊपर से दुनिया दिखला कर
चाँद नगर की सैर करा कर

पूछती दुनिया सुंदर क्यों है
मेरा घर चंदा पर क्यों है?

धरती पर मैं क्यों नहीं रहती?
बच्चों के संग क्यों नहीं पढ़ती?

क्यों नहीं है इस पे बसेरा?
चाँद पे होता घर जो मेरा


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