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| 05.03.2008 |
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चाँद पे होता घर जो मेरा |
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चाँद पे होता घर जो मेरा चंदा मामा के संग हँसती ऊपर से धरती को देखती देखती नभ में पक्षी उड़ते बादल से मैं पानी पीती टीमटिमाते सुंदर तारे कभी-कभी धरती पर आती चंदा मामा को भी खिलाती जब अंबर में बादल छाते धरती पर जब वर्षा करते में परियों सी सुंदर होती लाखों खिलौने मेरे सितारे धरती पर मैं जब भी आती नन्हे बच्चों को दे देती पढ़ती उनसे क ख ग चंदा को भी में सिखलाती बढ़ते कम होते मामा को बढ़ना कम होना नहीं अच्छा धरती पर से लोग जो जाते चाँद नगर की सैर कराती ऊपर से दुनिया दिखला कर पूछती दुनिया सुंदर क्यों है धरती पर मैं क्यों नहीं रहती? क्यों नहीं है इस पे बसेरा? |
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