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ISSN 2292-9754

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03.14.2016


ज़िंदगी भर यही सोचता रह गया

ज़िंदगी भर यही सोचता रह गया

मुझसे मुँह मोड़ कर तुम को जाते हुए,
मूक दर्शक बना देखता रह गया,
क्या मिला था तुम्हें दिल मेरा तोड़ कर,
ज़िंदगी भर यही सोचता रह गया???

भूलने के लिये तुमको हम ने जतन,
क्या नहीं हैं किये ए जान-ए-मन,
उतने ही याद आये हो तुम रात दिन,
अपनी यादों से मैं जूझता रह गया???

रास्ता जब बनी रास्ते की गली,
मैं जो गुज़रा कभी धड़कनें बढ़ गयीं,
एक खिड़की खुली और तुम्हें देख कर,
मैं जहाँ पर खड़ा था खड़ा रह गया???

ज़िंदगी भर यही सोचता रह गया


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