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05.31.2008
 

याद किया तुमने या नहीं
सीमा गुप्ता


यूँ ही बेवजह किसी से,
करते हुए बातें,
यूँ ही पगडंडियों पर
सुबह-शाम आते जाते
कभी चलते चलते
रुकते, संभलते डगमगाते..
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ

सुलझाते हुए अपनी
उलझी हुई लटों को
फैलाते हुए सुबह
बिस्तर की सिलवटों को
सुनकर के स्थिर करतीं
दरवाज़ी आहटों को
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..

बाहों का कर के
घेरा,चौखट से सर टिका के
और भूल करके दुनियाँ
साँसों को भी भुलाके
खोकर कहीं क्षितिज
में जलधार दो बुलाके
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..

सीढ़ी से तुम उतरते, या
चढ़ते हुए पलों में
देखूँगी छत से
उसको, खोकर के अटकलों में
कभी दूर तक उड़ाकर
नज़रों को जंगलों में
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..

बारिश में भीगते तो,
कभी धूप गुनगुनाते
कभी आँसुओं का सागर
कभी हँसते-खिलखिलाते
कभी खुद से शर्म करते
कभी आइने से बातें
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..

तुमसे दूर मैंने, ऐसे
हैं पल गुज़ारे,
धारा बिना हों जैसे
नदिया के बस किनारे..
बिन पत्तियों की शाखा
बिन चाँद के सितारे..
बेबसी के इन पलों
में...
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..
मुझे याद किया तुमने
या नहीं ज़रा बताओ..


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