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ISSN 2292-9754

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03.14.2016


वो

मेरी क़ब्र पे दो फूल रोज आकर चढ़ाते हैं वो,
हाय, इस क़दर क्यों मुझे तड़पाते हैं वो।

मेरे हाथों को छूना भी मुनासिब न समझा जिसने,
आज मेरी मज़ार से लिपट के आँसू बहाते हैं वो।

हाले यार समझ ना सके अब तलक जिनका,
मेरे दिल पे सर रख कर हाले दिल सुनाते हैं वो।

ज़िक्र चलता है जब जब मोहब्बत का ज़माने में,
मेरा नाम अपने लब पर लाकर बुदबुदाते हैं वो।

मुझसे मिलने में बदनामी का डर था जिनको,
छोड़कर सारी हया मेरी क़ब्र पे दौड़े चले आते हैं वो।

उनके ग़म का सबब कोई जो पूछे उनसे,
दुनिया को मुझे अपना आशिक़ बताते हैं वो।

कहे जो उनसे कोई पहने शादी का जोड़ा वो,
मेरी मिट्टी से माँग अपनी सजाते है वो।

मेरी क़ब्र पे दो फूल रोज आकर चढ़ाते हैं वो,
हाय, इस क़दर क्यों मुझे तड़पाते हैं वो।


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