अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.14.2016


मैं

क़लमों के टूटे ढेर थे मैं छेड़ता रहा,
लफ़्ज़ों के हेर फेर ने समझा नहीं मुझे....

कच्ची थी सोंधी ख़ाक में मैं बोलता रहा,
चाक़ों के एतबार ने चुपका किया मुझे...

लौहएमकान का राज़ था क्यों फ़ाश हो गया,
कुत्बों के इन्तख़ाब ने रुसवा किया मुझे...

ख़ारे-चमन था लेकिन चुप चाप जी गया,
कलियों की बेकली ने तड़पा दिया मुझे ....


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें