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03.08.2009
 

मैं
सीमा गुप्ता ’दानी’


क़लमों के टूटे ढेर थे मैं छेड़ता रहा,
लफ़्ज़ों के हेर फेर ने समझा नहीं मुझे....

कच्ची थी सोंधी ख़ाक में मैं बोलता रहा,
चाक़ों के एतबार ने चुपका किया मुझे...

लौहएमकान का राज़ था क्यों फ़ाश हो गया,
कुत्बों के इन्तख़ाब ने रुसवा किया मुझे...

ख़ारे-चमन था लेकिन चुप चाप जी गया,
कलियों की बेकली ने तड़पा दिया मुझे ....


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