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| 03.08.2009 |
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क़लमों के टूटे ढेर थे मैं छेड़ता रहा, कच्ची थी सोंधी ख़ाक में मैं बोलता रहा, लौहएमकान का राज़ था क्यों फ़ाश हो गया, ख़ारे-चमन था लेकिन चुप चाप जी गया, |
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