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ISSN 2292-9754

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03.14.2016


ख़त

आज लहू का कतरा कतरा
स्याही बना है,
और ये ज़ख्मी दिल ही ख़त
की लिखाई बना है।

दर्द बड़ा बेदर्द है,
वो ही गवाही बना है,
तार- तार हर दिल कोना
तबाही बना है।

देख मेरे चाहत का
किस्सा जग हँसाई बना है।
मेरे बर्बादी का सारा
ही जहां तमाशाई बना है।

नाम वफ़ा था जिसका वो
ही बेवफ़ाई बना है।
ज़ख़्मों से रिसता लहू
मेरी सच्चाई बना है।

कोई साथ नहीं हर मंज़र
तन्हाई बना है ,
आँसू का हर मोती मेरा
हमराही बना है।

ख़ूने दिल से लिखा ये
"ख़त", मेरी रुसवाई बना है,
घड़ी कयामत की है,
जिसमें जनाजा ही मेरी शहनाई बना है!


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