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ISSN 2292-9754

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03.14.2016


काफ़ी है

वफ़ा का मेरी अब और क्या हसीं इनाम मिले मुझको,
ज़िन्दगी भर दग़ाबाज़ी का सिर पे एक इल्ज़ाम काफ़ी है...

बनके दीवार दुनिया के निशाने ख़ंजर से बचाया था,
होंठ सी के नाम को भी राज़े दिल में छुपाया था,
उसी महबूब के हाथों यूँ नाम-ए-बदनाम काफ़ी है ...

यादों में जागकर जिनकी रात भर आँखों को जलाते थे,
सोच कर पल-पल उनकी बात होश तक भी गँवाते थे,
मुक़ाम-ए-मोहब्बत में मिली तन्हाई का एहसान काफ़ी है….

कभी लम्बी लम्बी मुलाक़ातें, और सर्द वो चाँदनी रातें,
चाहत से भरे नग़मे अब वो अफ़साने अधूरे हैं,
जीने को सिर्फ़ ज़हर-ए-जुदाई का ये भी अंजाम काफ़ी है

फिर भी फ़रमाइश किया है उसको मेरी जान ने,
और किया बदनाम दानी को है उसके काम ने...
अब तड़पता दिल है ’दानी’ का बहुत उसके लिये,
कह रहा है तुमसे आ जाओ अचानक मेरे सामने...


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