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03.15.2009
 

काफ़ी है
सीमा गुप्ता ’दानी’


वफ़ा का मेरी अब और क्या हसीं इनाम मिले मुझको,
ज़िन्दगी भर दग़ाबाजी का सिर पे एक इल्ज़ाम काफ़ी है

बनके दीवार दुनिया के निशाने ख़ंजर से बचाया था,
होंठ सी के नाम को भी राज़े दिल मे छुपाया था,
उसी महबूब के हाथों यूँ नामे-ऐ-बदनाम काफ़ी है ...

यादों मे जागकर जिनकी रात भर आँखों को जलाते थे,
सोच कर पल पल उनकी बात होश तक भी गवाते थे,
मुक़ाम-ए-मोहब्बत में मिली तन्हाई का एहसान काफ़ी है….

कभी लम्बी लम्बी मु्लाक़ातें, और सर्द वो चाँदनी रातें,
चाहत से भरे नग़मे अब वो अफ़साने अधूरे हैं,
जीने को सिर्फ़ ज़हर–ए-जुदाई का ये भी अंजाम काफ़ी है


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