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| 03.15.2009 |
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काफ़ी है |
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वफ़ा का मेरी अब और क्या हसीं इनाम मिले मुझको, बनके दीवार दुनिया के निशाने ख़ंजर से बचाया था, यादों मे जागकर जिनकी रात भर आँखों को जलाते थे, कभी लम्बी लम्बी मु्लाक़ातें, और सर्द वो चाँदनी रातें, |
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