अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.31.2008
 

चले आओ
सीमा गुप्ता


आज फिर दिल तुझे याद किए है चले आओ
आज फिर हर एक फरियाद लिए हैं चले आओ

हर तरफ़ मायूसियों से घिरे साए हैं
आज फिर ये दिल परेशान किए है चले आओ

हर एक चोट सिसक कर उभर आई है
आज फिर हर ज़ख़्म से लहू बहे है चले आओ

ये दिल बेआस, हर निगाह में प्यास है,
आज फिर मुलाकात को दिल चाहे है चले आओ

शिकवे किए खुद से, और शिकायतें भी हैं,
आज फिर हमें ये किस्से उलझाएँ हैं, चले आओ

तेरे आने का गुमान करती हर आहट है,
आज फिर ज़िंदगी से पहले मौत आए है चले आओ


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें