अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
02.26.2014


"डॉ. हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा: 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' से 'दशद्वार से सोपान तक' का सफर"

हरिवंश राय बच्चनसाहित्य कोई शाब्दिक आडम्बर नहीं है, यह अन्तःकरण का उद्गार है। मूक मन की अनुभूतियों को अपने साहित्यिक क्षेत्र में अभिव्यक्त करने के लिए लेखक अपने अन्तःकरण में विद्यमान ज्योति को प्रज्ज्वलित कर चरम शिखर पर पहुँचाते हुए अपने सांसारिक स्वरूप को साहित्यिक आवरण पहनाकर लेखन में स्थान देता है।

साहित्य में अभिव्यक्ति के विविध रूपों में मानव जीवन के सर्वाधिक निकट मानी जाने वाली विधा "आत्मकथा" है। आत्मकथा में रचनाकार अपने संपूर्ण जीवन के किसी अंश अथवा घटना का क्रमबद्ध वर्णन प्रस्तुत करता है। आत्मकथा में कल्पनाप्रवणता और रागपरक वैयक्त्तिक अनुभूति का प्राधान्य होता है। हिन्दी साहित्य के देदीप्यमान आत्मकथाकार डॉ. हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा हिन्दी-साहित्य की एक कालजयी कृति है। उन्होंने अपने जीवन की तस्वीर को ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ‘, ‘नीड़ का निर्माण फिर‘, ‘बसेरे से दूर‘ एवं ‘दशद्वार से सोपान तक में‘ रूपान्तरित किया है। यह बहुप्रशंसित आत्मकथा एक महागाथा है जो उनके जीवन और साहित्य का वृत्तान्त ही नहीं कहती अपितु उत्तर छायावादी युग के साहित्यिक परिदृश्य को भी प्रस्तुत करती है।

बच्चन का काल के अनुरूप तथा विभिन्न परिस्थितियों में रहते हुए अपने आपको सहृदयों के समक्ष प्रस्तुत करना और विभिन्न मानसिकताओं के दौर से गुज़रते हुए आत्मविवरण को प्रस्तुत किया गया है। बच्चन की बाल्यावस्था का अबोधपन, युवामन का आकर्षण, प्रेमानुभूति, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, पारिवारिक सम्बन्धों तथा स्वानुभूतियों से सम्बन्धित अनेक प्रसंगों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण बड़ी सहजता और तन्मयता के साथ किया गया है।

बच्चन द्वारा उम्र के विभिन्न पड़ावों में अलग-अलग रूपों मे सोचना जैसे - बालरूप, युवारूप और प्रौढ़ रूप एवं वृद्ध रूप इत्यादि उनकी आत्मकथा में मुखर हुआ है। उनकी आत्मकथा में पग-पग पर उनके मनोसंवेग विभिन्न रूपों में उभर कर आते हैं।

उनका सारा जीवन साधना एवं श्रम का जीवन रहा है। अपने बाहरी व्यक्तित्व के सन्दर्भ में वे स्वयं लिखते है "मैं कविता लिखता ही नहीं, मैं कवि दिखता भी हूँ।" जैसी मधुशाला थी वैसा ही मधुशाला का कवि रूप था।

उनका बाह्य एवं आंतरिक व्यक्तित्व पंत की इन पंक्तियों में मुखर हो उठा है –

"सिर पर बाल घने, घुंघराले, काले, कड़े बड़े, बिखरे से।
मस्ती, आजादी बेखबरी, बेफिक्री के है संदेसे।
माथा उठा हुआ ऊपर को भौहों में कुछ टेढ़ापन है।
दुनिया को है एक चुनौती, कभी नहीं झुकने का प्रण है।
आँखों में छाया प्रकाश की, आँख मिचौनी छिड़ी परस्पर।
बेचैनी में, बेखबरी में लुके-छिपे हैं सपने सुन्दर ।"

उनके व्यक्तित्व पर उनके परबाबा का प्रभाव विशेष रूप से परिलक्षित होता था। परबाबा की कदकाठी, लेखन-पठन में रुचि इत्यादि उनके व्यक्तित्व मे देखे जा सकते थे। अपने व्यक्तित्व के आन्तरिक रूप का चित्रण वे इन शब्दों में करते हैं -

"मैं गाऊँ तो कंठ स्वर न दबे औरों के स्वर से
जीऊँ तो जीवन की औरों से हो अलग रवानी।"

कवि के जीवन में व्यक्तित्व की विशिष्टता उनकी सामाजिक जीवनधारा और साहित्यिक धारा में स्वतः ही परिलक्षित होती है, वे आत्मकथा को जीवन की तस्वीर मानते हैं और इस तस्वीर में उन्होंने न केवल अपने गुणों का अपितु अपने दोषों को भी साहसिकता के साथ उजागर किया है। बच्चन की आत्मकथा के प्रथम भाग "क्या भूलूँ क्या याद करूँ" (सन् 1969) में प्रकाशित हुआ तब हिन्दी साहित्य में मानों हलचल सी मच गई। यह हलचल सन् 1935 में प्रकाशित मधुशाला‘ से किसी भी प्रकार कम नहीं थी।

"क्या भूलूँ क्या याद करूँ" में उन्होंने अपने जन्म से लेकर अपनी पत्नी श्यामा के असामयिक देहावसान तक के अनुभवों को चित्रित किया है। इस भाग के प्रारम्भ में उन्होंने अपने वंश की उत्पत्ति, गुणों एवं दुर्गुणों का परिचय दिया है। बच्चन बताते हैं कि उनके जन्म से पूर्व माता सुरसती एवं पिता प्रतापनारायण द्वारा हरिवंश पुराण विशेष रूप से पढ़े जाने के कारण उनका नाम हरिवंश राय रखा गया। बच्चन ने यहाँ अपनी बाल्यावस्था, पारिवारिक जीवन, शैक्षणिक जीवन, किशोरावस्था में कर्कल से निकटता, चंपा के प्रति आकर्षण और श्यामा के संग विवाह की अपनी अनुभूतियों को चित्रित करने का सुन्दर प्रयास किया है। इसी के साथ लेखक ने अपनी पारिवारिक-आर्थिक परेशानियों और श्यामा की बीमारी के दुःखते-कसकते अनुभवों को भी वाणी प्रदान की है।

आत्मकथा के द्वितीय भाग "नीड़ का निर्माण फिर" में श्यामा की मृत्यु से क्षुब्ध हुए लेखक का चित्रण है। श्यामा की असामयिक मृत्यु बच्चन को अत्यधिक व्यथित करती है, परन्तु अपनी आर्थिक स्थिति संतोषजनक न होने के कारण उन्हें विवश होकर इस मनःस्थिति से बाहर निकलना पड़ा। फिर बच्चन जीवन एवं साहित्य में स्वयं को पुनः स्थापित करने का प्रयत्न करते है। अब वे कवि सम्मेलनों में काव्य-पाठ के लिए जाने लगे तथा एम.ए. की पढ़ाई भी पुनः प्रारम्भ कर देते है। फिर अचानक आइरिस उनके जीवन में आई। उसके संकोची स्वभाव ने बच्चन के हृदय में आइरिस के प्रति प्रेम का भ्रम बनाए रखा।

वे अक्सर गर्मी की छुट्टियाँ व्यतीत करने के लिए बरेली जाते थे। वहीं उनकी मुलाकात तेजी से हुई। बच्चन के मित्रों ने उन्हें पुनर्विवाह के लिए तैयार किया। विवाहोपंरात तेजी के जीवन में आने पर जैसे बहार आ गई। तेजी ने दो पुत्रों (अमित एवं अजित) को जन्म देकर बच्चन के नीड़ का निर्माण किया।

"बसेरे से दूर" इनकी आत्मकथा का तृतीय भाग है। इसमें उन्होंने अपने जीवन की उस अवधि की कहानी सुनाई है जब उन्होंने अपने देश-नगर, घर-परिवार से दूर कैम्ब्रिज में रहकर विलियम बटलर ईट्स के साहित्य पर शोध कार्य किया। इस खण्ड का प्रारम्भ उन्होंने अंग्रेजी विभाग में अपने अध्यापन कार्य, साथी प्रवक्ताओं के परिचय के साथ किया है।

इसी दौरान ब्रिटिश कौंसिल से सूचना आई कि अंग्रेजी-साहित्य पढ़ाने की विधि का अवलोकन करें। लेकिन इस कार्य के लिए कैम्ब्रिज जाने के लिए उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। कैम्ब्रिज में रहकर बच्चन ने अपने शोध प्रबंध "डब्ल्यू बी. ईट्स के साहित्य में निगूढ़ तत्त्व" को पूर्ण किया। तेजी के अकेलेपन, आर्थिक संकटों एवं एक सिरफिरे सज्जन द्वारा प्राप्त हुई मानसिक प्रताड़ना को भी यहाँ अभिव्यक्ति मिली है। इसी भाग में उन्होंने अपनी नेपाल-यात्राओं एवं कलकत्ता की यात्राओं और कविता के सम्बन्ध में अपने विचारों और विदेश मंत्रालय में अपनी नियुक्ति की अनुभूतियों को भी मुखरित किया है।

"दशद्वार से सोपान तक" बच्चन की आत्मकथा का चतुर्थ भाग है। यह अन्य तीन भागों की अपेक्षा विस्तृत है। सुविधा की दृष्टि से बच्चन ने इस पुस्तक के दो भाग कर दिये है। प्रथम पड़ाव में सन् 1956 से सन् 1971 तक की घटनाओं का वर्णन है। दूसरे पड़ाव में सन् 1971 से सन् 1983 तक की घटनाओं का वर्णन है। आत्मकथा के प्रारम्भ में ‘अपने पाठकों‘ में ही लेखक ने ‘दशद्वार‘ और ‘सोपान‘ का अर्थ स्पष्ट किया है। जो उनके इलाहाबाद और दिल्ली के घरों के नाम है। ‘दशद्वार‘ जिसके दस दरवाजे हो, ‘सोपान‘ का अर्थ है सीढ़ी। यहाँ उन्होंने दस वर्ष तक विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषाधिकारी के पद पर छहः वर्षों तक राज्य सभा के मनोनीत सदस्य के रूप में रहने का जिक्र किया है। उन्होंने यहाँ अपने नाट्य-सृजन, अनुवाद, विदेश यात्राओं का उल्लेख भी किया है। बच्चन एवं तेजी का अपने दोनों पुत्रों एवं बहुओं के साथ रहने की स्मृतियों को संजोते उन्होंने अपने नवनिर्मित आवास ‘सोपान‘ में प्रवेश करने तक की जीवन-यात्रा को लेखनीबद्ध किया है।

डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने आत्मकथा साहित्य में उनके लेखकीय व्यक्तित्व और जीवन को प्रस्तुत किया है इस प्रक्रिया में उन्होंने अपनी अनुभूतियों, परिवेश, स्थानीय संस्कृति का तन्मयता से चित्रण किया है। बच्चन हिन्दी साहित्य में उन आत्मकथाकारों में से हैं जिनकी आत्मकथा का फलक अत्यन्त व्यापक है। समकालीन अनेक लेखकों ने इस आत्मकथा को हिन्दी इतिहास की ऐसी पहली घटना बताया जब अपने बारे में इतनी बेबाकी से सब कुछ कह देने का साहस किसी ने दिखाया। बच्चन ने अनुभूति और तन्मयता के अनुरूप रचनात्मक भाषा में स्वयं को अभिव्यक्ति प्रदान की है। आत्मीयता पूर्ण शैली में आत्मकथा लिखी गई है, जिसे पढ़कर सहृदय व्यक्ति, कथा-रस से सरोबार हो जाता है। जीवन एवं सृजन का एक पूर्ण चित्र इसमें साकार हो गया है। निःसन्देह यह आत्मकथा हिन्दी साहित्य की यात्रा का मील का पत्थर है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें