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11.08.2014


कृतज्ञता

यह संस्मरण मुझे अनायास ही मिलने वाले एक व्यक्ति के सद्व्यवहार से प्रेरित कर अतीत में खोकर सुखद यादों से मेरे मन को सुखमय करता रहा है। और समय-समय पर मुझे उस घटना की याद दिलाता है जब हम दोनों नवविवाहित जोड़ा बने रेलगाड़ी से बम्बई जा रहे थे। सफ़र लंबा था। बार-बार अपनी सीट पर लेटना चाहती थी परन्तु इतनी जगह नहीं थी कि मैं अपने पैर फैला सकूँ। जब रहा नहीं गया तो धीरे से अधलेटी होने का प्रयास किया। पास में बैठे यात्री ने अपने आप को सिकोड़ा ओर मुझे थोड़ी जगह मिली कि मैं अधलेटी हो बर्थ पर लेट गई। अपनी कमर को थोड़ा सा आराम दे रही थी, अचानक एक स्टेशन आ गया और गाड़ी रुक गई। स्टेशन की चहल-पहल और चाय कॉफ़ी की आवाज़ों ने तथा नए यात्रियों के सामान की उठा-पटक ने मुझे उठने पर मजबूर कर दिया। मैं अपनी बर्थ पर बैठी बाहर स्टेशन पर लगी घड़ी की ओर देख रही थी कि एक व्यक्ति हाथ में छोटा सा सूटकेस लिए हमारे सामने वाली सीट पर आकर बैठ गया।

मेरे पति ने उससे बात करना शुरू कर दिया तो पता लगा कि वह भी बम्बई ही जा रहा था। मन को थोड़ी राहत मिली कि चलो कोई और भी है जो बम्बई उतरेगा। डर था कि कहीं हम सोते न रह जाएँ और स्टेशन निकल जाए। गाड़ी सुबह के चार बजे पहुँचनी थी। धीरे-धीरे समय निकलता गया और सुबह के चार बजे गाड़ी बम्बई पहुँच गई। स्टेशन के आते ही अनेक आवाज़ें आने लगीं, हम भी दोनों उठकर अपना सामान समेटने लगे और गाड़ी से नीचे उतर गए। स्टेशन के बाहर जाकर जैसे ही हमने टैक्सी बुलाई, ट्रेन में हमारे सामने वाली सीट पर बैठे व्यक्ति मेरा पर्स हाथ में लिए हुए भागते आ रहे थे। हमें समझते देर न लगी कि मैं अपना पर्स सीट पर ही छोड़ आई थी, मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। वे सज्जन बोले कि सामान उठाते समय आप अपना पर्स मेरी सीट पर रखा छोड़ आयीं थी।

मेरे पर्स में कीमती चीज़ों के साथ ही हमारे घर की चाबियाँ भी थीं। समझ में नहीं आया कि किन शब्दों में उनका धन्यवाद करूँ। पति ने उन्हें कुछ रुपए देने चाहे परन्तु उनके चेहरे की शालीनता और सज्जनता को देखकर हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें कुछ रुपए दें। आज भी वह घटना याद आती है तो मन उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर उठता है।


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