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ISSN 2292-9754

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02.04.2018


धउका

सुना था गाँव वाली बात शहर में कहाँ? जब भी कोई शहर से कमा के आता या किसी काम से शहर जाकर लौटता तो यही बात दोहराता। मुनेसर भईया तो कह रहे थे कि धान की रोपनी हो जाए तो मेहरी-बच्चा को ले के शहर चले जायेंगे। शहर जाके बिरजू, दसई, सिरिकिशुन, घोघा, राधे सबका हुलिया बदल गया है। और तो और सब बड़कवा लोग अपना बाल बच्चा को शहर में रखते हैं। दीनानाथ काका का तो कोठी भी है शहर में। ये सब सुन के मेरा मन भी शहर की तिलिस्मी दुनिया के रहस्य को जानने के लिए बेचैन रहने लगा। यहाँ गाँव में तो अपना लोहा सब मानते ही हैं। शहर हो आएँगे तो और बात होगी। 'कलिया' भी गदगद हो जाएगी। सब ठीक रहा तो उसको भी ले के शहर चले जायेंगे।

'धुरर्र...... हट्ट धउका...…हट्ट.......धुरर्र......' किसी ने उसे भगाते हुए कहा। जी हाँ, यही नाम था उसका "धउका"। पूरे गाँव में क्या मजाल की कोई नया परिंदा भी आ जाए, दूर से ही भोंककर हालत ख़स्ता कर देता। काफ़ी धौंस थी, तभी शायद लोग धउका बुलाते थे। क़द-काठी क्या पूछना साहेब, लंबा-चौड़ा शरीर, चितकबरा रंग, बड़ी-बड़ी पनियाली आँखें, लपलपाती जीभ, दाँत ऐसे की चट्टान फाड़ दे, चाल ऐसी की कोई शेर जंगल का मुआयना कर रहा हो। लेकिन स्वाभाव में एक बड़प्पन झलकता था, कोई घमंड नहीं। मिल बाँट के खाना, सबके सुख-दुख में साथ रहना और बिरादरी में सबसे मेल-जोल रखना उसकी ख़ासियत थी। एक तरह से सार्जेंट था बिरादरी का पर कभी कोई अनेत नहीं किया, आजकल में नेता-मंत्रियों की तरह। बिरादरी की बहन-बेटियों की इज़्ज़त का ज़िम्मा भी ले रखा था। हाँ, 'कलिया' उसकी एक कमज़ोरी थी, उसको जी जान से चाहता था और वो भी बहुत चाहती थी। पर खुल के इज़हार-ए-मोहब्बत नहीं हो सका था।

आज बिरादरी वालों के सामने शहर जाने की बात रखी तो सब मान तो गए पर बड़े-बुज़ुर्ग थोड़ा चिन्तित थे। कह रहे थे बहुत अँधेर है शहर में इसीलिए चारों ओर बलब टाँगे रहते हैं लोग। 'कलिया' भी मन ही मन ख़ुश तो थी पर स्त्री सुलभ भय से ग्रस्त थी। चेहरे पर झूठ-मूठ का ग़ुस्सा और आँखों में सैलाब आ गया था। सबने अपने अपने हिसाब से नसीहतें दे डालीं।

शाम को झबरू मिलने आया तो देशी मुर्गे की कुछ हड्डियाँ थामते हुए फफक के रो पड़ा। लंगोटिया यार है मेरा झबरू, जन्म के पाँच दिन बाद जब माँ दुनिया में नहींरही तो झबरू की माँ ने ही पाला था। झबरू बताया कि "कल सुबह दीना काका का ट्रेक्टर सामान ले के शहर वाली कोठी पर जा रहा है। उसी में ट्रेलर के नीचे जुगाड़ फिट कर दिए है। पुआल भी बिछा दिए है। रात में जा के आसन जमा लेना।"

"ठीक है," ध‍उका ने कहा। "तुम कलिया का ध्यान रखना, हम जल्दी लौटकर आएँगे।"

विदा लेते हुए, आँखें भर आईं। रात में बिल्ली रो रही थी कुछ अमंगल होने का संकेत लग रहा था।

मुर्गा बोलते ही राजकुमार भैया गाड़ी हाँक दिए और मनेजर चाचा बगल में बैठ के सुर्ती लठने लगे। मनेजर चाचा अक्सर शहर जाते रहते हैं तो वहाँ की बातें राजकुमार भैया को बताते चल रहे थे। शहर का रोड, ऊँची-ऊँची कोठी, सिनेमा, मॉल, मोटर गाड़ी, तरह-तरह की बात जो हम कभी सुने भी नहीं थे ना विश्वास कर पा रहे थे। लेकिन जब बिरादरी की बात छिड़ी तो ध्यान दे के सुनने लगा। मनेजर चाचा बता रहे थे कि वहाँ तो हमारी बिरादरी वाले बड़े ऐश में हैं। हाकिम लोगों के साथ उठना-बैठना है। मेम साहब लोग तो गोद में लिए घूमती हैं। खाना-पीना, ओढ़ना-बिछौना सब ए-क्लास का है। सब टाइम-टू-टाइम मिलता है। यह सब सुन के हम कलिया को याद करने लगे।

"जल्दी ही ले के आएँगे कलिया को!" यह बात मन में फिर दोहराये।

बड़ी-बड़ी दुकानें, कोठी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें, शायद शहर आने ही वाला है। सूरज निकल रहा है। एक ढाबा देख के मनेजर चाचा ने गाड़ी रुकवाया और हल्का हो के राजकुमार भैया के साथ चाय-नाश्ता किया। मौका देख के हम भी दोना-पत्तल की ओर रुख किए। किसिम-किसिम का पकवान फेंका पड़ा था। जी भर खाएँ, कोई रोकने वाला भी नहीं था। यह पहला वाकया ही मनेजर चाचा के बात पर भरोसा पक्का कर दिया। खा के फिर अपने स्पेशल सीट पर जा के बैठ गए।

गाड़ी कोठी पर पहुँच गई। इलाक़े में ऊँची-ऊँची कोठी थी। सभी कोठियों पर बिरादरी वालो का कब्जा था। चाँदी की जंजीर पहने, बैठे-बैठे ही भोंक रहे थे। गजब की रईसी थी। सबके अलग-अलग अंदाज थे, कोई विलायती, कोई फ्रांसीसी, कोई कुछ और। बिरादरी की कुछ छोरिया एकदम सफ़ेद ख़रगोश लग रहीं थीं, देख के होश ही उड़ गया। इसी बीच मौका देख के बाहर आया। एक कोठी के किनारे हल्का होना चाहा तो मालिक ने इतने जोर से डाँटा कि सिट्टी-पिट्टी गुम हो गया। खैर, थोड़ा देर वही बैठ के आराम किए, तभी देखते-देखते सब लोग मोटर पर सवार होकर अपने-अपने काम पर चल दिए।

इलाका सुनसान पड़ा था। सोचा यही मौका है बिरादरी के लोगों से बातचीत कर मेलजोल बढ़ने का। एक बिलायती नसल के भाई साहब दिखे, पास पहुँचा तो बात सुनने से पहले ही डाँट-डपटकर भगा दिए, किसी थाना के इंचार्ज की तरह। फिर दूसरे के पास गया तो इन्होंने भी रौब दिखाना शुरू किया पर एक हड्डी दिखाने पर बात करने के लिए राजी हुए। थोड़ी बहुत जानकारी दी फिर, दूसरी हड्डी की माँग करने लगे, सरकारी दफ्तर के बाबुओं की तरह। पेट फूल के नगाड़ा हुआ जा रहा था फिर भी लालच कम नहीं थी, उनको अलविदा किया। एक सफ़ेद खरगोशिन जैसी छोरी दिखी, मन मचला, सोचा चल के बतियाते है काम बन गया तो रहने का भी जुगाड़ हो जाएगा। देशी मुर्गे की हड्डी दिखाई तो दो-चार बार ना-नुकुर करने के बाद बात बन गई। उसकी आत्मीयता और मिठास देख के मैंने सब हड्डी दे दी। उसने भी बड़े प्यार से मेरा हाथ थामकर आँखों में देखते हुए साथ रहने की सहमति दे दी। पर, दो घंटे बाद जब सब हड्डी खत्म हो गई तो वह चंद्रमुखी ज्वाला उगलने लगी।

"देखो! देखो! ये गँवार हमें अकेली देख के छेड़ रहा है।"

"अजब अनेत है। कितना झूठ बोलती हो तुम, इंसानों की तरह।"

"अच्छा जी देखो, अब ये जाहिल हमें झूठा बना रहा है, मारो इसे।"

बस इतने देर में मालिक का हंटर दे दनादन चलने लगा शुरू के चार-पाँच तो याद हैं। फिर कुछ भी याद नहीं।

शाम को जब आँख खुली तो नाले के किनारे पड़ा था। दर्द के मारे जान निकल रही थी। भूख भी जोरों की लगी थी। आसपास नजर दौड़ाया तो सब ओर बड़ी-बड़ी साफ सुथरी दुकानें दिखीं, मॉल और होटल दिखे। काफी खोजबीन की पर कुछ नहीं खाने का नहीं दिखा। मरता क्या न करता, सामने से एक मेमसाहब अपने टॉमी को बिस्कुट खिलाती हुई ले के आ रही थी। बिना कुछ भी सोचे-विचारे हम बिस्कुट पर टूट पड़े। लेकर भागने में सफल भी हुए पर दर्द के मारे ज्यादा दूर नही जा सके और फिर कितना पीटा कुछ भी होश नहीं। हाय से जमाना कोई खाते-खाते मरे कोई बिना खाये मरे।

जब आँख खुली तो देखा एम्बुलेंस जैसी गाड़ी सामने खड़ी है एक मेम साहेब मेरा मरहम-पट्टी कर रही थी। ऐसा लगा की ये लोग ही स्वर्ग के एजेंट है। पर जब उनकी बात सुनी तो मोह भंग हो गया। ये लोग भी एक कोरम ही पूरा कर रहे थे। ये नौकरी, पैसा, सरकारी कार्यक्रम या किसी एन जी ओ का भविष्य सुरक्षित कर रहे थे। खैर थोड़ी राहत तो मिली, तभी एक बाबूजी ने कुछ बिस्कुट मुह में खिलाया। बिलकुल दीनानाथ काका की तरह दिख रहे थे। उनसे कई बार घर ले चलने को कहना चाहा पर वे भी दान-धर्म में इतने मशगूल थे कि मुह में जबरजस्ती बिस्कुट ठूसकर सेल्फी लेने में लगे रहे और आने-जाने वालों से अपना बड़प्पन सिद्ध करते।

रात होने लगा, हल्की बारिश शुरू हो गई, कुछ समझ में नहीं आ रहा था करें तो क्या? बड़े-बुजुर्गों की सब बातें एक-एक कर याद आने लगी। कलिया का चेहरा सामने नाच रहा था। आँखों का वो सैलाब और प्यार भरा गुस्सा भी। तभी म्युनिस्पैलिटी की गाड़ी आई, दो मुस्टंडे इंसान रस्सी फेककर बाँध लिए जबकि मैं चुपचाप बैठा था, भागने की क्षमता ही कहा थी। उठा के गाड़ी में पटक दिया। सिर के बल गिरा और खून-खून हो गया सिर। पर परवाह किसे था। म्युनिस्पैलिटी ऑफिस में पहले ही बिरादरी के काफी लोग थे, सभी खुश थे, खा पी रहे थे, लगा यहाँ कुछ ठीक है शायद। बरामदे में बैठाया गया। साहब लोग आपस में कुछ बात किए फिर चले गए। न मरहम-पट्टी, न खाना पीना, न ओढ़ना-बिछौना, ऊपर से ये बारिश रुकने का नाम न ले। छीटे सीधे बरामदे में आ रहे थे। कुछ देर इंतजार करने के बाद पूछने पर पता चला कागजी कार्यवाही पूरी नहीं हो पाई है और पहचान भी संदिग्ध है। शक है कि कोई घुसपैठी या आईएसआईएस के एजेंट तो नहीं। कल तो रविवार है, छुट्टी का दिन। अब जो होगा परसों ही होगा।

"भूऊऊऊ ........ऊऊऊऊऊऊऊ......ऊऊईईई.....भुईईईई"

दर्द और जाड़ की वजह से मुह से आवाज निकल रही थी। तभी एक साहब ने आकर जोरदार एक लात रसीद कर दी।

"चुप साले, सोने भी नही देता चैन से!"

खुलकर रो भी नहीं सकते शहर में, किसी लाश की नींद उचट सकती है। बार-बार कलिया का, झबरू का ध्यान आ रहा था। गाँव, बिरादरी, दोस्त, बड़े बुजुर्गों की बातें सब बहुत याद आ रहीं थीं। ये शहर जिन्दा नहीं लाशों का स्वर्ग है। आत्मा नहीं बस लाशें रहती है यहाँ। जिनकी पहचान सिर्फ कागजी है। चेहरे पर फजूल की हँसी टाँगे मशीन की तरह घूमते हैं दिनभर। यहाँ आकर तो बिरादरी वाले भी शहरी भाषा सीख गए हैं।

सुबह हुई तो अफरा-तफरी का माहौल था, मीडिया, मंत्री गला फाड़ के न्याय दिलाने के वादे कर रहे थे। "धउका" आँखें खुली-खुली रह गई थी, मानो सबका झूठ, दिखावा देख रहा हो। मुह से लार निकलकर सूख चुका था और खून भी जम गया था। साहेब ने धउका के खाल के पाँच सौ रुपए एक व्यापारी से लिए और लाश उसके हवाले किया। परंतु, धउका शहर के पिंजड़े से आज़ाद होकर खुश दिख रहा था।


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