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09.07.2008
 

व्यथा
सत्येन्द्र सिंह चाहर


 दिल के कागज़ पर लिखी, वह एक पुरानी पाती है।
नाम चाहे जो कह लो, पूजा, ज़िन्दगी या स्वाति है।।

रेत के घरौंदो पर जब भी उकेरता हूँ चित्र कोई।
जाने क्यूँ जाने अनजाने उसकी तस्वीर उभर आती है।।

सोचा था कभी जीवन भर, यूँ ही साथ रहेगा हमारा।
लेकिन नियति की मंजूरी से, आँख मेरी भर आती है।।

नये समय की रौनक में वो सब याराना भूल गये।
हर किसी की नईं हैं राहें, राहें निभा न पाती है।।

जब कभी यादें अपने गुज़रें पलों की आती है।।
हाल बयां क्या करूँ मैं, यारो जान सी मेरी जाती है।।


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