अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.21.2008
 

सपना
डॉ. समणी सत्यप्रज्ञा


सपना था फिर भी अपना या
अपना था फिर भी सपना था?
उलझन की इस अमर बेल में
आखिर तो मन को खपना था॥

कितने सच थे समय-समय के,
कितने भ्रम थे समय-समय के।
समझौतों के साथ अन्ततः
जीवन में सबको तपना था॥
सपना था फिर भी अपना या
अपना था फिर भी सपना था?

इस तट पर साम्राज्य अनय का,
उस तट पर है स्रोत अमिय का।
ऐसी आकांक्षा में मति के,
उप्त बीज का क्या उगना था॥
सपना था फिर भी अपना या
अपना था फिर भी सपना था?

सहज सत्य सौन्दर्य हृदय में,
श्वास शिवशंकर स्व-आश्रय में।
शिव-साधन है देह-नाव का,
तरना ही सचमुच तरना था॥
सपना था फिर भी अपना या
अपना था फिर भी सपना था?

उलझन की इस अमर-बेल में
आखिर तो मन को खपना था॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें