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02.16.2008
 

राही! रुकती नहीं जवानी
डॉ. समणी सत्यप्रज्ञा


राही! रुकती नहीं जवानी
चलते चल अभिमानी!
मानी मंज़िल मात्र निशानी।।

छोड़ो जग के जाल तूफानी
क्यूँ दृग में है पानी ?
क्यूँ मंजरियों के बल गूँजे
कोकिल तेरी वाणी ?
मुक्त कण्ठ हैं मुक्त गगन है
तेरी आत्म कहानी।
राही! रुकती नहीं जवानी
चलते चल अभिमानी!
मानी मंज़िल मात्र निशानी।।

अपने उर में अपना घर हो
क्यूँ दर दर दीवानी ?
क्यूँ डेरों से प्रीत लगाती
पल दो पल वीरानी।
चाहों से चातक रातों में
मिलते नहीं सयानी।
ये हैं बातें बहुत पुरानी।।
चलते चल अभिमानी!
मानी मंज़िल मात्र निशानी।।


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