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02.16.2008
 

कविते! तू आयी
डॉ. समणी सत्यप्रज्ञा


तड़पन की साँसों पर पल कर, कवि हैं प्रसव-वेदना पायी
संसृति के अनुभव की लम्बी, उम्र लिए कविते! तू आयी॥

सिर से पैर, पैर से सिर, तन तड़प-तड़प कर हारा
एक थपेड़ा कर्तव्य का, एक मोह का मारा
शून्य जड़ित, गति मंद चेतना, तब कविते! तू आयी॥
तड़पन की साँसों पर पल कर, कवि हैं प्रसव-वेदना पायी॥

हा-हा दुःख द्वन्द्व गीतों को, कौन सुने सूने जंगल में,
बियाबान, श्मशान, घोरतम कौन छिपायेगा अँचल में,
बंद आँख अपने साए से मिल कविते! तू आयी॥
तड़पन की साँसों पर पल कर, कवि हैं प्रसव-वेदना पायी॥

स्मित रेखा से खँचित तुम्हारा, मुख देखा हरषाया कवि मन
शब्द-शब्द सुन्दर सरूप लख भूल गया उर सुध बुध चेतन
एकाकी पथ में छाया सम सहयायी कविते! तू आयी॥
तड़पन की साँसों पर पल कर, कवि हैं प्रसव-वेदना पायी॥
संसृति के अनुभव की लम्बी, उम्र लिए कविते! तू आयी॥


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