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05.18.2008
 

जाया न करो
डॉ. समणी सत्यप्रज्ञा


केवल मन की मुक्त उड़ानें बन के तुम आया न करो।
सपनों! तुम केवल सपनों में आकर ही जाया न करो॥

सच के अभिमुख रहना चाहूँ, सच बनकर ही जीना चाहूँ।
इसीलिए स्मृति! बंधन बनकर जब चाहे छाया न करो॥
सपनों! तुम केवल सपनों में आकर ही जाया न करो॥

चिंतन चेतन में उतर आए, सार्थकता के क्षण दे जाए।
मात्र काल्पनिक दुनिया में तुम गोते ही खाया न करो॥
सपनों! तुम केवल सपनों में आकर ही जाया न करो॥

वर्तमान शुभ हो अतीत से, वर्तमान शुभ दे भावी को।
इसीलिए तुम वर्तमान से किञ्चित भी माया न करो॥
सपनों! तुम केवल सपनों में आकर ही जाया न करो॥

पल-पल जागृत सत्य सुदर्शन, पल-पल पाएँ अपना दर्शन।
भीतर का प्रभु भूल, गीत बाहर के ही गाया न करो॥
सपनों! तुम केवल सपनों में आकर ही जाया न करो॥


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