डॉ. समणी सत्यप्रज्ञा
कविता
अटक मत जाया न करो जो चाहो तो मौन होने दो राही! रुकती नहीं जवानी कविते! तू आयी तोड़ चुकी मैं तार सखे! सपना साँस की कीमत चुकाएँ