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ISSN 2292-9754

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12.23.2018


पिता

मैं भी कभी पिता बन
पिता होने के उस एहसास
को पाना चाहती हूँ 

कि कैसे रोक लेते हैं पिता
आँसुओं के नदी को और
फिर बन जाते हैं वे
ख़ुद ही समंदर

कि कैसे मुस्कुराते हैं पिता
जीवन के कठिन क्षणों में भी
और ख़ुद बन जाते हैं
राहतों के पल

कि कैसे दिल थाम बने
रहते हैं सहज और शांत पिता
अपनी जवां होती बिटिया 
को देखकर

कि कैसे अपने बेरोज़गार बेटे 
को बँधाते हैं ढाढस
और सम्भालते हैं उसकी
भी गृहस्थी को

कि कैसे तंगी के दिनों भी
बच्चों पर नहीं आने देते 
किसी भी परेशानी के
बादल

कि कैसे कभी नहीं करते 
किसी सेअपने बीमारियों का ज़िक्र 
और होते जाते हैं खोखले
अंदर ही अंदर

कि कैसे अपने पूरे परिवार से
दूर किसी अनजान से शहर में
गुज़ार देते है पूरी उम्र
ताकि परिवार के लिए जुटा सकें
सुविधाओं के दिन

कि कैसे अपनी बिटिया सौंप
देते हैं अजनबियों के हाथों
पर अपने दर्द उभरने नहीं देते
चेहरे पर

कि कैसे छुपाते हैं अपने बुढ़ापे को
और अपने थकते शरीर को
ढोते रहते हैं अपने ही कंधों पर

कि अपने आने वाले अंतिम
क्षणों की आहट सुनकर भी
बने रहते हैं अपनों के लिए
एक मज़बूत-सी छत

हाँ एक बार पिता बन
उनके एहसास को, उनके
जज़्बात को, उनके संस्कार को,
उनकी ऊँचाई को,
हृदय की गहराई को छूना 
चाहती हूँ 

काश एक बार.....


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