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ISSN 2292-9754

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02.22.2017


विद्यानिवास मिश्र के निबन्धों में लोकसंस्कृति एवं परम्पराबोध

अत्याधुनिकता की अंधी दौड़ में जहाँ लगभग सभी रचनाकारों की रचनाओं में कुण्ठा, संत्रास, अकेलापन दिखाई दे रहा है (या वे ज़बरदस्ती यही दिखा रहे हैं), वहीं विद्यानिवास मिश्र के सृजन में "हल्दी दूब और दधि-अच्छत" का साथ तथा "मेरा गाँव घर" की तरफ़ जाना एक ऐसी मानसिक शीतलता प्रदान करता है, जहाँ "मुरली की टेर" है, "रूपहला धुँआ" है और उसमें डूबा हुआ "बनजारा मन" है। विद्यानिवास मिश्र चाहे जहाँ भी रहें स्वदेश या विदेश में, उनके "गांव के मन" में "पीपल के बहाने" "शिरीष की याद" आ ही जाती है, जिसके इधर-उधर "कास के फूल" खिलखिलाते रहते हैं और वहीं पर फागुन में "शेफाली झर रही" होती है तो रातों में "दीया एवं जुगनू" अपनी चमक बिखेर रहे होते हैं।

विद्यानिवास मिश्र को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद उनकी परम्परा को विकसित करने वाले एक श्रेष्ठ ललित एवं आत्मव्यंजक निबंधकार के रूप में सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई है। उनका पहला निबंध संग्रह "छितवन की छाँह" सन् 1953 में प्रकाशित हुआ, इसकी भूमिका में इन्होंने लिखा था-

"वैदिक सूक्तों के गरिमामय उद्गम से लेकर लोकगीतों के महासागर तक जिस अविच्छिन्न प्रवाह की उपलब्धि होती है, उस भारतीय भावधारा का मैं स्नातक हूँ।"1 मिश्रजी के निबन्धों में संस्कृत साहित्य की अभिजात रस चेतना, आधुनिक भावबोध, एवं लोक-जीवन की स्वच्छंद प्राणमयी रसधारा का अद्भुत सामन्जस्य है। इनके निबन्धों में अधिकांशतः लोकतत्व सम्पन्न ऐतिहासिक सांस्कृतिक बोधपरक एवं सृजनात्मक ललित चेतना का विस्तार देखा जाता है। अपने निबंध "संस्कृति और समन्वय" में वे लिखते हैं कि -"ऊपर से लगता है, संस्कृति एक उधार ली हुई अवधारणा है और कल्चर का पर्याय है, पर जाने और अनजाने हमारी संस्कृति की अवधारणा में कुछ नये तत्व भी जुड़ गये हैं। संस्कृति एक प्रकार की संस्करणात्मक परिणति है।"

मिश्रजी ने निबंध संग्रह "गाँव का मन" में लोकतत्व, लोकाचार, लोकजीवन एवं लोकसंस्कृति के दर्शन कराते हुए स्वाभाविक रूप से इनका शास्त्रीय वैभव से समन्वय कराया है। इनमें लोकसंस्कृति का उद्घाटन करते हुए लोकपरम्परा की गहन अनुभूतियों को अभिव्यंजित किया है। "हल्दी-दूब और दधि-अच्छत" निबंध में वे लिखते हैं, "क्या जादू है कि मन की कोर में लगी हल्दी नहीं छूटी जीवन प्रान्तर में उगी हुयी दूब और परिसर में बिछी हुई अच्छत राशि क्षत-विक्षत नहीं हुई।2 उनके निबंधों में "लोक" प्राण तत्व की तरह समाया हुआ है। एक साक्षात्कार में लोक को व्याख्यायित करते हुये वे कहते हैं कि- "बचपन से ही मैं "माँ" के ललित कण्ठ से लोकगीत सुनता रहा हूँ और उसकी आस्था को देखता रहा हूँ... मेरे लिए "लोक" का अर्थ मेरी माँ और उसकी परम्परा है। उसे प्राणतत्व समझें, जीवन तत्व समझें, पोशण तत्व समझें।"3

पश्चिमी संस्कृति का नक़ली अनुकरण और आधुनिक मानव का खोखलापन इनके निबन्धों में दर्द बनकर उभरता है। वर्तमान समय में चाहे रचनाकार हों या तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग, अपनी परम्परा एवं संस्कृति की चर्चा करना उसे अपनी रचना में स्थान देना "एक मूर्खतापूर्ण कार्य" तथा "समय से पीछे चलना" समझते हैं। कभी-कभी तो इनकी चर्चा करने वाले को रूढ़िवादी, या अतीतजीवी कह कर उपहास भी उड़ाया जाता है। विद्यानिवास मिश्र इस विषय पर अपने निबंध "परम्परा आधुनिक भारतीय सन्दर्भ" में कहते हैं-

"परम्परा शब्द धीरे-धीरे बुद्धिजीवी लोगों के बीच में वर्जित होता जा रहा है। मैं समझता हूँ, यह एक खतरनाक स्थिति है। परम्परा का खण्डन एक अलग बात है क्योंकि उस खण्डन से ही परम्परा का विकास होता है, परन्तु परम्परा को नकारना एक दूसरी ही स्थिति है, जो चिंतन और सर्जन में खोखलेपन और परायेपन को जन्म देती है।"4

मिश्र जी यह मानते हैं कि परम्परा हमें आगे ले जाती है, हमारे समय के विकासमान बीज हमारी परम्परा में ही पाये जाते हैं, इसलिए परम्पराओं को सुरक्षित रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य भी है। "सम्मान की स्वीकृति" निबंध में कहते हैं वाचिक गूँज या अनुगूँज नहीं, जीवित शरीर भी है। उन गुरूओं के विग्रह में मूर्तिमान रही है, जिन्होंने मुझे राह के बल दिखाई ही नहीं, राह पर चलना ही नहीं, सिखाया, राह बनाने की विधि भी बताई।"5

प्राचीन कहावत है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। आज इसी प्रकार वर्तमान पीढ़ी ने बिना अपनी परम्परा व संस्कृति को समझे ही पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वे अपने आँगन में सूख रहे पेड़ की जड़ों में पानी न डालकर किसी और के पौधारोपण के व्यापार की नक़ल कर रहें हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी प्रसिद्ध कृति "घरे-बाइरे" में लिखा है- "जब हम अपने घर के भीतर होते हैं तो उसकी आलोचना करते हैं जिससे उसका विकास और तेज़ हो, परंतु जब घर से बाहर होते हैं तो लोगों से हम उसकी अच्छाइयों को बताते हैं।" किन्तु वर्तमान में हमारे देश के बुद्धजीवी यहाँ तो हमारी आलोचना करते ही हैं, विदेशों में भी चाटुकार बने रहने के लिए हमारी संस्कृति और परम्परा की बुराई बताते हुए उसे बदलने के लिए लम्बे-लम्बे भाशण देते हैं। यही कारण है कि आज "सब नर करहिं परस्पर प्रीती" की जगह स्वार्थपरायणता ने ले ली है।

जिनके संस्कृति, चरित्र, आचरण को हमने हेय माना, आज हम उनकी नक़ल करते-करते उन्हीं की तरह होते जा रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र ने लोकसंस्कृति एवं परम्पराओं की केवल कोरी कल्पना ही नहीं की थी, बल्कि उन्होंने उसे जिया भी था और अपने जीवन को उससे रससिक्त भी किया था। उन्होंने अपने निबंध "हल्दी-दूब और दधि-अच्छत" में कहा है-

"मेरे घर की संस्कृति के मांगलिक उपादान मूर्त रूप में हल्दी-दूब और दधि अच्छत ही हैं, इसलिए शहर में एक लम्बे अरसे तक बसने के बाद भी मन इन मंगल द्रव्यों की शोभा के लिए ललक उठता है।"6

विद्यानिवास मिश्र जी के लोक संस्कृति एवं विशेषतः परम्परा विषयक विचारों का सार यही है कि हम अपनी-अपनी लोकसंस्कृति से तब तक सम्पृक्त नहीं हो सकते, जब तक अपने अभिजात गुणों को छोड़कर हम निर्लिप्त भाव से उसके शरण में नहीं जायेंगे। "बेचिरागी गांव" शीर्षक नामक निबंध में वे कहते हैं- "लोक संस्कृति कहती है कि "तुम लोक का उद्धार करो। मैं अपना उद्धार स्वयं कर लूँगी। तुम मेरी पुरइन के पात, बेला के फूल, आम्र-पल्लवों की बंदनवार, हल्दी-दूब के थाल, कदंब की डाल, नदियों के बहाव, दिये की लौ, माथे के सुहाग, कानों के युवांकुर जूड़े के कुरबक, सूत के कंगन से अपने घर के आंगन या अपने मण्डप को अथवा अपने शरीर को सजाकर क्या करोगे? मेरे ये शृंगार मेरी आत्मा के शृंगार हैं, और यदि तुम इस आत्मा को पाना चाहते हो तो तुम्हें अपने उन शहरी संस्कारों को विसर्जित करके आना होगा।"7

इस प्रकार हम देखते हैं कि विद्यानिवास मिश्र जी ने अपने निबंधों में न सिर्फ़ लोक संस्कृति एवं परम्परा को स्थान दिया, बल्कि उसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा, परखा व विश्लेषण किया तथा उसकी महत्ता को रेखांकित करते हुए जीवन में अपनाने की सलाह दी।

सन्दर्भः

1. मिश्र विद्यानिवास "छितवन की छांह" पृ. 13 लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद संस्करण 2003
2. मिश्र विद्यानिवास "गांव का मन" पृ. 79, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली संस्करण 1905
3. पुश्पिता, "सांस्कृतिक आलोक से संवाद" पृ. 75 भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन नई दिल्ली संस्करण 2006
4. मिश्र विद्यानिवास, वसंत आ गया पर कोई उत्कण्ठा नहीं पृ. 13 लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद संस्करण 2002
5. मिश्र विद्यानिवास, संचयिता (सम्पादक-दयानिधि मिश्र) पृ. 150 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 2015
6. मिश्र विद्यानिवास, संचयिता (सम्पादक-दयानिधि मिश्र) पृ. 150 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 2015
7. मिश्र विद्यानिवास, तुम चंदन हम पानी पृ. 05 नेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली संस्करण 2000

शोधार्थी
सत्यप्रकाश तिवारी
इन्दिरा कला संगीत विवि. खैरागढ छ.ग.


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