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ISSN 2292-9754

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09.30.2014


उनकी माँ को अक्सर मैंने, कपडे धोते ही देखा है!

उनकी माँ को अक्सर मैंने, कपडे धोते ही देखा है!

बेटा, मैंने इस जीवन में
ऐसा इक इंसान न देखा!
जीवन के झंझावातों में
जिसने कोई कष्ट न देखा!
वैभव सम्पन्नों का जीवन बीमारी से लड़ते बीता,
धनकुबेर जितने पाये थे, उनको रोते ही देखा है!

अपने अपने सुख दुःख लेकर
हम सब दुनिया में आये हैं,
अपनी आदत व्यवहारों से
इस दुनियां को भरमाये हैं,
जो बखान करते हैं अपने, बड़ी शान से बातें करते,
उनकी माँ को अक्सर मैंने, कपड़े धोते ही देखा है!

शुभचिंतक से, लगते सारे
चेहरों पे विश्वास न करना
गुरु मन्त्र पा, उस्तादों से
ऐसे भी उपवास न करना
भक्तों को रोमाँचित करके, रहे नाचते रंगमंच पर,
श्रीवर, संत, साध्वी हमने, मूर्ख बनाते ही देखा है!

पूरा जीवन बीते इनका
अपनी तारीफें करवाने
बैठे जहाँ, वहीं गायेंगे
अपने सम्मानों के गाने
ऊपर पहलवान से लगते, बार बार पिटते बस्ती में!
पगड़ी बाँधे इन पुतलों को, घर में लुटते ही देखा है!

जीवन भर चेहरे दो रखते
समय देख कर रंग बदलते
सड़ा हुआ सा जीवन लेकर
औरों पर ये, छींटे कसते!
रोज दिखायी देते ऐसे रावण मन, रामायण पढ़ते,
श्वेतवसन शुक्राचार्यों को, मंदिर में बैठे देखा है!


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