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ISSN 2292-9754

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09.07.2014


परायी हुई बिटिया

कैसे प्यार घटा, पापा की
बिटिया, का दरवाज़े से
कैसे प्यार छिना गुड़िया
का, भारी गाजे बाजे से
जब से विदा हुई है घर से, क्या कुछ बहा, हवाओं में!
कुछ तो दुनियां ने समझाया, कुछ अम्मा की बाँहों ने!

किसने सीमाएँ समझायी
किसने गुड़िया छीनी थी!
किसने उसकी उम्र बतायी
किसने तकिया छीनी थी!
कहाँ गए अधिकार पुराने, क्या सुन लिया दिशाओं में!
कुछ तो बहिनों ने बतलाया, कुछ कह दिया हवाओं ने!

कहाँ गया भाई से लड़ना
अपने उन, सम्मानों को!
कहाँ गया अम्मा से भिड़ना
अपने उन अधिकारों को!
कुछ तो डर ने समझाया था, कुछ पढ़ लिया रिवाजों में!
कुछ भाभी ने हँसकर बोला, कुछ कह दिया इशारों ने!

पापा की जेबें, न जाने
कब से राह, देखती हैं!
कौन तलाशी लेगा आके
किसकी चाह देखती हैं!
कुछ दूरी पर रहे लाड़ली, सुखद गाँव की छाँवों में!
कुछ गुलमोहर ने समझाया, कुछ घर के सन्नाटों ने!

कैसे बड़ी हो गयी मैना
कैसे उड़ना सीख लिया!
कैसे ढूँढें, तिनके घर के,
कैसे जीना सीख लिया!
खेल, खिलौने खोये अपने, इन ससुराल की राहों में!
कुछ समझाया, सबने रोकर, कुछ बाबुल की बाँहों ने!


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