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ISSN 2292-9754

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01.01.2016


माँ की दवा को चोरी करते, बच्चे की वेदना लिखूँगा!

ज़ख़्मी दिल का दर्द, तुम्हारे
शोधग्रंथ, कैसे समझेंगे?
हानि लाभ का लेखा लिखते,
कवि का मन कैसे जानेंगे?
हृदय वेदना की गहराई, तुमको हो अहसास, लिखूँगा!
तुम कितने भी अंक घटाओ, अनुत्तीर्ण का दर्द लिखूँगा!

आज जोश में, भरे शिकारी
जहर बुझे कुछ तीर चलेंगे!
विषकन्या संग रात बिताते
कल की सुबह, नहीं देखेंगे!
वेद ऋचाएँ समझ न पाया, मैं ईश्वर का ध्यान लिखूँगा!
विषम परिस्थितियों में रहकर, मैं केवल शृंगार लिखूँगा!

शिल्प, व्याकरण, छंद, गीत,
सिखलायें जाकर गुरुकुल में
हम कबीर के शिष्य, सीखते
बोली, माँ के आँचल से!
जो न कभी जीवन में पाया, मैं वह प्यार दुलार लिखूँगा!
बिना पढ़े दुनिया समझेगी, मैं ऐसी अभिव्यक्ति लिखूँगा!

हमने हाथ में, नहीं उठायी,
तख्ती कभी क्लास जाने को!
कभी न बस्ता, बाँधा हमने,
घर से, गुरुकुल को जाने को!
काव्यशिल्प, को फेंक किनारे, मैं आँचल के गीत लिखूँगा!
प्रथम परीक्षा के, पहले दिन, निष्कासित का दर्द लिखूँगा!

प्राण प्रतिष्ठा गुरु की कब
से, दिल में, करके बैठे हैं!
काश एक दिन रुके यहाँ
हम ध्यान लगाये बैठे हैं!
जब तक तन में जान रहेगी, एकाकी की व्यथा लिखूँगा!
कितने आरुणि, मरे ठण्ड से, मैं उनकी तकलीफ लिखूँगा!

कल्प वृक्ष के टुकड़े करते,
जलधारा को दूषित करते!
तपती धरती आग उगलती
सूर्य तेज का, दोष बताते!
जड़बुद्धिता समझ कुछ पाए, ऐसे मंत्र विशेष लिखूँगा!
तान सेन, खुद आकर गाएँ, मैं वह राग मेघ लिखूँगा!

शब्द अर्थ ही जान न पाए,
विद्वानों का वेश बनाए!
क्या भावना समझ पाओगे
धन संचय के लक्ष्य बनाए!
माँ की दवा को चोरी करते, बच्चे की वेदना लिखूँगा!
श्रद्धा तुम पहचान न पाए, एकलव्य की व्यथा लिखूँगा!


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