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ISSN 2292-9754

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09.07.2014


कुछ टूटा सा विश्वास लिए, रहती थी दर्द भरी जैसी!

अच्छा है बुढ़िया चली गयी, थी थकी हुई बदली जैसी
दर्दीली रेखाएँ लेकर, लगती थी कुछ मुरझायी जैसी!

बरगद के नीचे ठंडक में कुछ दिन से थी बीमार बड़ी!
धीमे धीमे बड़बड़ करते, लगती थी कुम्हलायी जैसी!

कुछ बातें करती रहती थी, सिन्दूर, महावर, बिंदी से
कुछ टूटा सा विश्वास लिए, रहती थी दर्द भरी जैसी!

भूखी पूरे दिन रहकर भी, वह हाथ नहीं फैलाती थी,
आँखों में पानी भरे हुए, दिखती थी, अभिमानी जैसी!

कहती थी, उसके मैके से, कोई लेने, आने वाला है!
पगली कुछ बड़ी बड़ी बातें, करती थीं महारानी जैसी!

अपनी किस्मत को कोस रहीं, अम्मा रोई सन्नाटे में
कुछ प्रश्न अधूरे से छोड़े, बहती ही रही पानी जैसी!

कल रात हवा की ठंडक में, काँपती रहीं वे आवाज़ें!
कोई माँ न झरे ऐसे जैसे, आँसू से भरी बदली जैसी!


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