अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
09.07.2014


जीवन भर कैसे

जीवन भर कैसे, पछताना पड़ता है!
कैसे बेमन समय, बिताना पड़ता है!

राजनीति में, धन का धंधा होता है,
ऐसे क्यों हर बार, बताना पड़ता है!

नाग देख के, कौवे शोर मचाते हैं!
मूर्खों को हर बार, चिताना पड़ता है!

हम पर हमले से, पहले तो सोचोगे!
बीच में पहले, राजपुताना पड़ता है!

रोटी, पानी, कपडे, दवा और दारु को
उनको कितनी बार, सताना पड़ता है!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें