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09.28.2008
 

स्त्री
सरोजनी नौटियाल


ए स्त्री समाज में तेरे लिये
तयशुदा पैमाने हैं
तेरी कोशिश है
तू उसी में देखी जाये और समझी जाये
तुझे प्रेम और करूणा की
देवी कहा गया
तुझे त्याग और समपर्ण की
प्रतिमूर्ति कहा गया
इससे भी आगे
यत्र नार्युस्तु पूजन्ते
रमन्त तत्र देवता
भी लिखा गया
तुम्हारे हृदय को आसमान्य रूप से
बढ़ा हुआ मान लिया गया
जिसमें इस लोक की
समस्त विसंगतियाँ
विलीन हो जाती है
भाई के समक्ष तुम्हारी अहमियत
पति के घर तुम्हारी हैसियत
तुम्हें लेकर समाज की कैफ़ियत
तुम सबमें समरसता से
जी जाती हो
ऐसी तुम्हारी नियति
बना दी गई है
तुम पति को देखे बिन भी
विधवा होती रही हो
पति के संग भी
परित्यक्ता रही हो
इस निर्लज्ज लोक ने
लज्जा की पोटली तुम्हें थमा दी है
इसे ढोना ही तुम्हारा स्त्रीत्व है
हे विशाल हृदया!
तुम पति के शव के साथ
ज़िन्दा जलाई जाती रही हो
दहेज के लिये
आग से आज भी
झुलसा दी जाती हो
अब तो अस्तित्व में आने से पहले ही
माँ की कोख में मार दी जाती हो
जलने-मरने का अभ्यास है तुम्हें
हे अग्नि प्रिया!
तुम्हें अपनाया जाता है
तुमने पति को छोड़ा
तुम कुलटा हो
पति ने तुम्हें छोड़ा
तुम परित्यक्ता हो
हर हाल में विशेषण तुम्हीं को मिलेगा
तुम्हारे लिये विशेषणों की कमी नहीं है
तुम्हें तुम्हारे नाम से कम
विशेषणों से अधिक पुकारा जाता है
तुम विशेषणों से घिरी हो नारी
कब पहचानोगी अपने को?
साहस?
साहस तो पुरूषों का भूषण है पगली
स्त्री साहस तो एक दुर्घटना है
तुम्हारे साहस से तुम्हारे अपने ही कितने असहज हो जाते हैं
समाज में कमजोर पड़ जाते हैं
इसलिये तो
तुम्हें सहनशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है
शर्म और हया की दुहाई पर
विषपान कराया जाता है
तुम अन्दर से दरक जाती हो
तुम्हारा वजूद आँसू बन बह जाता है
तुम्हारा अर आँसू का रिश्ता
सदियों से बदस्तूर चला आ रहा है
इस असमंजस भरे माहौल में
तुम्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है
शिव ने एक बार विषपान किया
और वे नीलकंठ हो गये
तुम तो रोज विष पीती हो
जाने कितनी बार
खुद से लड़ती हो
और हर बार हार जाती हो
तुम्हें जीतना सीखना होगा नारी
तुम्हें लड़ना सीखना होगा नारी

(हिन्दी दिवस नारी सशक्तिकरण पर मंच से यह कविता बोली थी सरोजनी नौटियाल ने)


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