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09.28.2008
 

चिन्तन
सरोजनी नौटियाल


गोष्ठियों के गलियारों में
कार्यक्रमों के पैमानों में
शोध पत्रों के किनारों में
सभाओं में सेमिनारों में
चिन्तन सचमुच महान है
देश के भविष्य का सवाल है
पर ये सब दीवारों में बन्द फिलहाल है
क्योंकि
जिसके दर्द से ये बेहाल है
वो खानों कारखानों में
कबाड़ के अम्बारों में
फुटपाथ के किनारों में धूप के अंगारों में
शीत के प्रहारों में
और वर्षा की बौछारों में हैरान है।


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