अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
11.03.2007
 
राम की दीवाली
सरोज भटनागर

कैकई का मन डरा डरा
सहमा सहमा सा घबराया हुआ
राम के आने का समय आया
सब और खुशियाँ ही खुशियाँ छाईं
नगर निवासियों ने सजाये बन्दन, तोरन द्वार
नगर डगर सब सजा सजा
महलों की शान में बिगुल बजा

दीयों व फूलों से सजी कौशल्या एवं
सुमित्रा की दीवाली
मन नाचता मोर शोर कर
आयेंगें किसी समय भी राम घर
दीप मालाओं से रोशन घर घर
दीयों की रोशनी ने
किया दूर चौदह वर्ष का अंधकार।

अब राम सीता और लक्षमण
के मुख को निहारेंगे
दीयों के प्रकाश में
जो छुपा हुआ था अंधकार
मन हर्षित डोल रहा
हर एक का मन बोल रहा
कैसे मिलेगी कैकई मइया
आँख ना मिला पायेंगीं दइया।

पर राम आये प्रफुल्लित मन
सब से गले मिले प्रसन्न मन
चारों ओर निहारा ....,
कहाँ हैं मेरी केकैई मइया?
दौड़ द्वार पर उन के धाये
चरण छू आँसू बहाये
मन का मैल धुल गया
माँ का स्नेह मिल गया
कुछ मुँह से केकैई बोल न पाई
आँखों ही आँखों से व्यथा सुनाई
राम उन्हें द्वार से बहार लाये
उन के हाथों से दीये जलवाये
दानों के निर्मल हृदय मिल गये
रौशनी से मन भर गये
ऐसी मनी थी कैकई राम की दीवाली।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें