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11.03.2007
 
ज़िन्दगी (क्षणिकाएँ)
सरोज भटनागर

 1
दिल कुछ सोच कर
गुदगुदा जाता है
कि राह में दो कदम चल कर
कोई मुस्कुरा जाता है
ना जाने कभी कोई क्षण
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बना जाता है।
2
ज़िन्दगी जब भी कभी
ख़ुद को पढ़ा करती है
एक हल्की सी पीड़ा
मुँह पर चादर ओढ़ लेती है,
दुख इतने मिले कि
पलकों से चुन लेती हूँ
अरे - सुख एक मिला
वो भी बोझ बन गया।
3
हँस रहा था अभी वह
और घर जाते जाते मर गया
ज़िन्दगी और मौत का
फ़ासला तो देखिए ज़रा।
4
ज़िन्दगी ने जो ग़म सहा
वह औरों का दिया नहीं था
वो ज़ख़्‍म ख़न्जरों के भी नहीं थे,
मीठे बोल रेशम में लपेटे
बहुत बार सुने हैं अपनों से।

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