अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.17.2016


बिखराव

ये बिखराव घन जंगल का।
मेरे मन के अंदर का।
कहीं झाड़ी पेड़ पौधे तो,
कहीं जड़ - चेतन का।
ये बिखराव मन से मन का।

अच्छा होता समझता
दर्द यदि मानव जन-जन का
न कटते वृक्ष हरे-भरे।
न उजड़ते बाग़ भरे।
न मरते पंक्षी,
न फिर धूप मे जलते
पंख तितलियों के।

न होती उलफत पर्यावरण की।
न गमलो में बाग सिमटते।
न संरक्षण कोयल कूक की।
न तरसते आवाज सुनने को
तोते की हम सब।
फिर न होती चिंता
वन संरक्षण की।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें