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08.16.2007
 
 आओ हिन्दी सीखें

 आओ हिन्दी सीखें

लेखक : डॉ. सरिता मेहता

प्रकाशक : स्वर्ण पब्लिकेशनज़

पंचकुला -१३४ १०९ (हरियाणा) भारत,

टेलिफोन: ०१७२-४६११२४६

इ-मेल : swarpublisher@yahoo.com
            सम्पर्क :  http://www.hindi4us.com/

मेरी पीढ़ी के भारतवंशी दुनिया के चाहे किसी भी कोने में रहें, सभी के मन में एक ही प्रश्न रहता है कि क्या हमारी सन्तान हमारी सांस्कृतिक धरोहर को अपना पाएगी? संस्कृति, रीति-रिवाज, साहित्य, कला और जीवन शैली सभी एक दूसरे के सहारे टिके रहते हैं। एक के शिथिल होते ही दूसरे अंगों का पतन आरम्भ हो जाता है। किसी भी फलती-फूलती सभ्यता का मूल भाषा ही होती है – ऐसा प्रायः कहा जाता है। इसी कारण विदेशों में रहने वाले हिन्दी भाषी परिवारों में इस बात पर विशेष बल दिया जाता है कि किसी भी तरह बच्चों को हिन्दी से परिचित करवाया जाए। कई बार तो भारत से आए हुए मित्र और रिश्तेदारों को इस बात पर आश्चर्य होता है कि हमारे बच्चे हिन्दी समझते हैं, हम उनसे हिन्दी में बात करते हैं।

यू.एस.ए. और कैनेडा में शायद ही कोई ऐसा शहर होगा जहाँ पर हिन्दी भाषी पर्याप्त मात्रा में रहते हों और बच्चों को हिन्दी पढ़ाने का प्रयास न किया जा रहा हो। हिन्दी की कक्षाएँ चाहे मन्दिरों में लगें या हिन्दी स्थानीय शिक्षा के पाठ्‍यक्रम का भाग हों, हिन्दी सिखाने का प्रयत्न हो रहा है। अब प्रश्न है कि हिन्दी शिक्षा की पुस्तकें कैसी हों? क्या भारत की लिखी पुस्तकें उपयुक्त हैं? क्या उत्तरी अमेरिका में जन्मा विद्यार्थी भारतीय संदर्भ में दी गई उदाहरणों को सहजता से समझ पाएगा? यह दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इस संदर्भ में डॉ. सरिता मेहता की पुस्तक आओ हिन्दी सीखें  उत्तरी अमेरिका के हिन्दी विद्यार्थियों के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, यू.एस.ए. के महासचिव अनूप भार्गव इस पुस्तक के विषय में कहते हैं- भारत से दूर रह कर बच्चों को वैज्ञानिक तरीके से हिन्दी सिखाना एक चुनौती भरा काम है। सरिता मेहता जी की पुस्तक इस विषय में एक सराहनीय प्रयास है। विभिन्न माध्यमों का प्रयोग करते हुए वह पुस्तक को रोचक बनाने में सफल हुई हैं जो कि बच्चों की एकाग्रता को बनाए रखने के लिए एक अनिवार्य शर्त है।

हिन्दी शिक्षा केन्द्र, न्यूयॉर्क, यू.एस.ए. की प्राचार्या, रचिता सिंह लिखती हैं –सभी भारतवंशी यही चाहते हैं कि उनके बच्चे अपनी भाषा, भेष और भोजन से जुड़े रहें। ऐसे में हिन्दी भाषा ही हम सबको एक सूत्र में बाँध सकती है। श्रीमती सरिता मेहता जी ने भी अपने हिन्दी प्रेम का परिचय देते हुए अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर प्रवासी भारतीयों की आने वाली पीढ़ियों को आओ हिन्दी सीखें पुस्तक के रूप में अनमोल उपहार दिया ही। यह बिल्कुल वही पुस्तक है जिसकी मैंने अपने हिन्दी के नन्हें विद्यार्थियों के लिए कल्पना की थी।  वह आगे कहती हैं, यह पुस्तक केवल बच्चों के लिए ही उपयोगी नहीं है बलिक जो वयस्क हिन्दी का प्रारंभिक ज्ञान लेना चाहते हैं, यह उनके लिए भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होगी।

अन में पुस्तक की लेखिका डॉ.सरिता मेहता के अपने ही शब्द उनके उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं –

हम, केवल हम ही हैं, एक सेतू पुरानी और नई पीढ़ी में,

जो बाँध सकते हैं पूर्व, पश्चिम और उत्तर दक्षिण को

एक भाषा की डोर में।

पाठ ज्ञान का जो हमने अपने बड़ों से सीखा था,

वो संस्कार जो हमने बचपन से पाए थे।

हमें वही प्रेम और त्याग अपने बच्चों को सिखाना है।

आज तुम पर और हम पर यह बहुत बडी ज़िम्मेदारी है।

और इस ज़िम्मेदारी को हमें बखूबी निभाना है।



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