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| 11.03.2007 |
| प्यार पूजा सारिका सक्सेना |
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प्यार के इस सागर में बस डूब के मैंने
देखा है
इन कच्चे धागों में बंधकर बस यूँ ही मैंने देखा है प्यार है एक प्यास ऐसी, बुझ कर भी नहीं जो है बुझती अपना तो यही है सच कि बस इस प्यास को पी कर देखा है किसी से छुपाये कहाँ iछपती है आँखों में है जो तस्वीर बसी दुनिया की किसी तस्वीर में भी हमने तो तुम्हीं को देखा है दिन और रात के जैसे हम रोज ही मिलते बिछड़ते हैं तेरा इंतज़ार करते खुद को हर शाम ढले ही देखा है नहीं पता प्यार है पूजा या पूजा ही कोई प्यार है हमने राधा किशन की मूरत में खुद को और तुमको देखा है |
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