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ISSN 2292-9754

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11.08.2014


उसका आसमान

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने के बाद भी अभी हॉस्टल दूर था। ऑटो वाले ने मेन रोड पर ही उतार दिया था। अकेली लड़की देखकर भी उसे उस पर तरस नहीं आया था। मेन रोड से होस्टल काफी अंदर था। ऑटो वाले को मन ही मन गाली दे वह उसे पैसे देकर भागती-सी चल रही थी। सारा ज़माना ही बेदर्द है फिर ये ऑटोवाला कैसे उसका दर्द समझ सकता है। सोचती हुई वह हाँफती-सी होस्टल के गेट तक पहुँची तो चौकीदार ने प्रश्नाकुल नज़रों से उसे देखा फिर उसने अपनी घड़ी देखी तो रात के साढ़े दस बज रहे थे, फिर इधर-उधर देखते हुए उसने गेट खोल दिया। चलो कोई तो उसे समझता है , उसने सोचा। वर्किंग विमेन होस्टल के सख्त नियमों में यह नियम भी शामिल था कि रात दस बजे तक सभी होस्टल में हों। बड़े शहरों में जहाँ महिलाएँ छोटी प्राइवेट कंपनियों से लेकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों, फ़र्मों में काम करती हैं और देर रात घर लौटती हैं, वहाँ के वर्किंग विमेन्स होस्टल में शायद ये नियम लागू नहीं होते होंगे पर उज्जैन जैसा छोटा शहर इन नियमों से प्रभावित नहीं होता।

कमरे में पहुँचकर दीपाली ने नुसरत को कुछ पढ़ते हुए पाया। "आ गई मैडम," नुसरत चहककर बोली।

"खाना भी खा आई होगी," नुसरत फिर बोली।

"हाँ खा आई हूँ," इससे पहले कि नुसरत कुछ और पूछती दीपाली ने ही जवाब दिया।

"चलो अब फ्रेश होकर सो जाओ, मैं भी सो रही हूँ। सुबह मेरी प्रेज़ेन्टेशन है।"

दीपाली नुसरत से अभी बातें करना चाहती थी पर नुसरत का मूड देखकर चुप रह गई। नुसरत-उसकी रूममेट। हैदराबाद की रहने वाली है। यहाँ उज्जैन की एक प्रतिष्ठित दवाइयों की कम्पनी में मैनेजर है। पाँच साल इसी कंपनी में मार्केंटिंग एगक्यूटिव रहने के बाद इस पोस्ट तक पहुँची है। बिंदास और हॅंसमुख है। दीपाली के इस शहर के संसार में एक यही तो है जो उसकी अपनी है। उसका अपना परिवार तो हरिद्वार में है- माँ, पापा और छोटा भाई। जिनसे अब कभी-कभी फ़ोन पर ही बात होती है। माँ बुलाती है, छोटा भाई मनुहार करता है- दीदी आ जाओ। पर वह नहीं जा पाती, या जाना नहीं चाहती। जब नई-नई इस शहर में आई थी तो उसका मन नहीं लगता था यहाँ। उसने स्कूल की किताबों में पढ़ा था कि क्षेत्रफल की दृष्टि से मध्यप्रदेश सबसे बड़ा राज्य है भारत का। मानचित्र में ही इस राज्य की सीमाओं को छुआ था उसने। आज उसी राज्य के एक छोटे-से शहर में समा गई है-दीपाली। हरिद्वार जाने का उसका मन नहीं करता अब। कारण कई थे, पर कौन-सा कारण मज़बूत था और कौन-सा कमज़ोर यही वह तय नहीं कर पाती थी-उसकी नौकरी,उसका प्रेम-प्रत्युष या कुछ और? इस कुछ को वह आज तक नहीं समझ पाई थी।

प्रत्युष के साथ बिताई गई शाम भी उसे नींद के आग़ोश में नहीं ले जा सकी। कितनी ख़ुश थी वह सुबह से कि ऑफ़िस के बाद वह और प्रत्युष फ़िल्म देंखेंगें और फिर डिनर साथ करेंगें। फ़िल्म देखी, डिनर किया, ख़ूब बातें कीं। बातें-जिनका कोई ओर-छोर नहीं होता। कभी तो वह चहक कर अपनी बात कहती और कभी दाशर्निक अंदाज़ में प्रत्युष को जीवन का दर्शन देने का प्रयास करती। वही बातें-घर, परिवार, नौकरी, नुसरत की बातें, प्रत्युष के ऑफ़िस की बातें। प्रत्युष के साथ अपने भविष्य को लेकर उसने उससे कोई बात कभी नहीं की। यह कोशिश न प्रत्युष की तरफ़ से हुई न उसकी तरफ़ से। रात अधिक गहरा गई थी। नुसरत गहरी नींद में थी। उसने भी सोने की व्यर्थ-सी कोशिश की।

सुबह दीपाली खिली हुई थी। रात अपने साथ कितना कुछ बहा कर ले जाती है। शायद रात भी जानती है कि अगला दिन हर किसी के जीवन में बहुत कुछ नया लेकर आता है। उस नए के लिए भी उसे जगह बनानी है और उसे तो हर रात की तरह ही बीत जाना है। ऑफ़िस में ज़रूरी काम निपटा दीपाली ने माँ को फ़ोन किया पर माँ का फ़ोन बिज़ी आ रहा था। पापा के मोबाइल पर बात कर सकती थी पर उसने नहीं की। उसकी उँगलियाँ पापा के फ़ोन के नंबरों को दबाते-दबाते रह गईं। पापा उसका बहुत ध्यान रखते हैं, बात होने पर हाल-चाल पूछते हैं। पर फिर भी माँ की तरह पापा से नहीं जुड़ पाती है-दीपाली। बचपन से माँ के बहुत करीब रही है, पापा उसके आदर्श हमेशा रहे, आज भी हैं, पर आदर्श के साथ अपनी निजता हम कभी नहीं बाँट पाते। पापा के लिए सम्मान उसकी नज़रों में बहुत है। उसके लिए उसके पापा हर बेटी के पिता की तरह सबसे प्यारे पापा हैं। पर माँ शायद उसकी अपनी जैसी है। उसे लगता कि उसकी माँ और वह किसी घटना, व्यक्ति या किसी मुद्दे पर एक ही तरह से सोचते हैं। पापा किसी विषय का एक तार्किक निष्कर्ष देते हैं, पर सारे तर्क-वितर्कों से परे वह माँ के निष्कर्षों पर न्यौछावर हो जाती। दीपाली उस दिन को आज भी नहीं भुला पाती जब दसवीं पास करने के बाद ग्यारहवीं में पास-पड़ोस की सब लड़कियों ने सांइस विषय लिया था पर वह साइंस नहीं लेना चाहती थी। उसे यह विषय ही नीरस लगता था। क्यों किसी व्यक्ति, वस्तु का रेशा-रेशा खोल कर रख दिया जाए, फार्मूले रटकर एग्ज़ाम दो, उबाऊ विषय। उसे कविता पसंद थी। कवि ने कविता लिख दी अब उसमें नए-नए अर्थ ढूँढते रहो। वह भी नए-नए अर्थों को ढूँढती। कितनी सृजनात्मकता है, मस्तिष्क कितनी दिशाओं में दौड़ पड़ता है - अर्थ के लिए। पापा की भी सख़्त हिदायत थी कि वह भी बाकी लड़कियों की तरह साइंस ले। कैरियर अच्छा रहेगा। माँ को उसने अपनी पसंद बताई थी पर पापा से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। घर का माहौल गंभीर था, पापा बेटी से साइंस ग्रेज्युएट होने की उम्मीद रखते थे और बेटी कल्पना के पंख लगा साहित्य के क्षेत्र में उड़ने को तैयार थी। माँ ने ही रात को बताया था कि पापा मान गए हैं। कल जाकर वह आर्टस विषय में दाखिला ले सकती है। पापा कैसे माने़? पता नहीं। माँ-पापा के बीच क्या बातें हुई? पता नहीं? माँ तो कहकर चली गई, दीपाली बहुत ख़ुश हुई, पर पापा जो चाहते थे वह नहीं करना चाहती थी दीपाली। आज साइंस में तो नहीं इंग्लिश विषय में ग्रेजुएट है दीपाली। एम.बी.ए. है और एक प्रतिष्ठित कंपनी में एच.आर. मैनेजर है। 12लाख का पैकेज है साल भर का। दीपाली जो चाहती थी उसने वह किया। दीपाली ख़ुश है और माँ भी ख़ुश है कि उसकी दीपाली ख़ुश है।

माँ का ही फ़ोन आया था। वही बातें- अपना ध्यान रखना, कुछ पड़ोसियों की बातें, उसकी किस सहेली की शादी हो गई, किसका बेटा या बेटी हुई है। इससे आगे माँ कुछ नहीं कहती। दीपाली जानती है इन बातों का क्या मतलब है। माँ भी तो अपनी 28 साल की दीपाली के विवाह की आस लगाए बैठी है। पापा ने एक बार इसी कारण से बुलाया भी था पर वह नहीं जा पाई थी। उसने नई कंपनी ज्वाइन की थी, छुट्टी नहीं मिल पायी थी, पापा ने फिर दोबारा नहीं बुलाया। न ही घर जाने पर दोबारा इस विषय पर कोई बात ही की थी।

उज्जैन आए चार साल हो गए थे। मंदिरों का शहर-उज्जैन बहुत भला लगने लगा था अब। हरिद्वार जैसी पवित्र नगरी में जहाँ धर्म के नाम पर कुछ तथाकथित लोग ठगी जैसे कामों में संलग्ल थे, वहीं इस नगरी में उसे ऐसा अनुभव अभी तक नहीं हुआ था। हाँ उसके ऑफ़िस में ऐसे लोगों की कमी नहीं थी, जहाँ गलाकाट प्रतियोगिता थी। सब एक दूसरे को रौंद कर आगे बढ़ना चाहते थे। दीपाली का पद और पैकेज सबकी आँखों की किरकिरी था। जय मेहता और उसकी ज्वाइनिंग साथ की थी पर वह उससे आगे निकल गई थी। जय की नज़रों में उसने कई बार अपने लिए अतिरिक्त स्नेह देखा था पर वह उसे अनदेखा कर गई थी। पर प्रत्युष के आर्कषण में बँधने से वह ख़ुद को नहीं रोक पाई थी जो रोज़ ही बस में ऑफ़िस जाते वक्त उससे टकरा जाता था। आज जय दस महीने की बेटी का पिता है पर दीपाली आज भी सिंगल है। पर वह प्रत्युष के साथ ख़ुश है।

सब कुछ शायद ऐसे ही चलता। समय ऐसे ही बीतता पर जब तक कुछ असामान्य न हो जीवन, जीवन कैसे हो सकता है। उस दिल हॉस्टल वापिस पहुँची तो विज़िटर्स काउंटर पर माँ-पापा को देखकर हैरान रह गई। न कोई फ़ोन, न कोई लैटर। क्या कारण था वह समझ नहीं पाई थी। अचानक उन्हें अपने सामने देख एक अनजानी आशंका से घिर आई थी। कहीं प्रत्युष के बारे में उन्हें पता तो नहीं चल गया। नुसरत माँ-पापा के साथ ही बैठी थी।

"आप लोग यहाँ? "उसके मुँह से अचानक ही निकल गया था। पापा कुछ गंभीर-से लगे, माँ बहुत प्यार से मिली। दोनों को साथ ले दीपाली पास ही के रेस्टोरेंट में जा बैठी। दीपाली की आंशका सच निकली। पापा चुप ही रहे, माँ ने ही शुरूआत की- "दीपाली बेटा, कुछ-कुछ अंदाज़ा है मुझे। पर मैं तुझसे सुनना चाहती हूँ। तेरा शादी के बारे में क्या ख़्याल है। कोई तेरी पसंद का है तो हमें बता दे। हमने सोचा तू तो घर आने में अब टालमटोल करती है हम ही चलें। घूमना भी हो जाएगा और तेरी शादी की बात...."

पापा अपनी गंभीरता हटाकर बोले- "जीवन इतना सरल नहीं होता बेटी, जितना ऊपर से दिखाई देता है। उसके कई पहलू होते हैं। एक इंसान को अपने जीवन में कई ज़िम्मेदारियाँ निभानी होती हैं, उसके कई कर्तव्य होते हैं। मेरे जीवन का लक्ष्य था- तुम्हारी और तुम्हारे भाई की अच्छी शिक्षा, अच्छा कैरियर। वह सब तुमने पा ही लिया है अब मैं चाहता हूँ तुम विवाह करो। मुझे भी मौका दो कि मैं अपने जीवन की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाऊँ। देखो दीपाली जीवन का हर रंग अच्छा है। हर रंग में घुलने के लिए तैयार रहो। तुम्हें यहाँ कोई लड़का पसंद है तो हमे बताओ। वरना हम भी कोशिश करते हैं, पहले भी की है तुम्हीं ने कोई सहमति नहीं दी इस बारे में आज तक।"

अपने पापा के मुख से इतनी स्पष्ट बातें दीपाली ने अपने बारे में पहली बार सुनी थीं। वह पिता को देखती रह गई थी। क्या कहे वह? कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे। प्रत्युष के बारे में बताए वह पर आज तक दोनों के बीच विवाह को लेकर कभी कोई बात ही नहीं हुई थी। सो चुप लगा गई।

माँ-पापा भी उज्जैन के होटल में रुककर थोड़ा उज्जैन घूमे फिर चले गए। दीपाली की चुप्पी को उसकी मौन स्वीकृति समझ वे चले गए। इन दो दिनों तक दीपाली ने भी प्रत्युष से कोई बात नहीं की। बस उसे एक मैसेज कर दिया। उनके जाने के बाद दीपाली ने पहली बार ख़ुद को इस शहर में अकेला समझा। उसे लगा सच में उसका बचपन उससे बहुत दूर निकल गया है। उसके घर का आँगन, त्यौहारों की धूम, सहेलियों के साथ उसकी धमाचौकड़ी आज उसे फिर से याद आने लगी......

दीपाली का जीवन फिर उसी पुराने ढर्रे पर चलने लगा। आफिस ,हॉस्टल, नुसरत, प्रत्युष। दीपाली प्रत्युष के साथ फिर से घूमने फिरने लगी है पर अब वह प्रत्युष की आँखों में कुछ ढूँढने की कोशिश करती है। प्रत्युष उससे शादी के बारे में क्यों नहीं पूछता? वह सोचती। एक दिन दीपाली ने ही कोशिश की थी। प्रत्युष की बाँहों का घेरा जब उसे कसने लगा था तो उसने ही उसकी पकड़ से बचने का नाटक करते हुए पूछा था- "कब तक यूँ ही मिलते रहेंगें प्रत्युष? क्या हम एक साथ हमेशा के लिए साथ..."

प्रत्युष की पकड़ ढीली हो गई थी। उसने कोई जवाब नहीं दिया था।

तीन महीने बीत गए थे। माँ के फ़ोन से ही सुबह दीपाली की आँख खुली थी। अगले महीने की 18 तारीख को बुलाया था। क्यों बुलाया था? दीपाली जानती थी। माँ लड़के के परिवार की जन्मपत्री भी बताने को उतावली थी। पर दीपाली सुनना नहीं चाहती थी।

"बाद में बात करती हूँ माँ, अभी उठी हूँ।" आज शुक्रवार था प्रत्युष के साथ घूमने का दिन था, ऑफ़िस के बाद फिल्म, शॉपिंग, डिनर....।

ऑफ़िस के लिए निकलने लगी तो नुसरत श्रारत से हंस कर बोली थी-"कब तक आओगी आज?"दीपाली बिना जवाब दिए मुस्कराकर चल दी थी।

हॉस्टल से ऑफ़िस के रास्ते तक माँ के फ़ोन के बारे में ही सोचती रही दीपाली। क्या बात करूँगी माँ से? क्या जवाब दूँ? जाना तो मुश्किल है ही। माँ पापा को अंदाज़ा है ही कि शायद ही आएगी? सोचते-सोचते ऑफ़िस के दरवाज़े तक पहुँची तो ऑफ़िस के डायरेक्टर मिल गए थे- मि. शौरी। आज उससे पहले ही आ गए हैं क्या? उसने सोचा कहीं वह लेट तो नहीं हो गई है। घड़ी देखी पर वह लेट नहीं थी सोचकर आश्वस्त हुई। सीट पर आ फाइलें देखने लगी, आज की मीटिंग्स के शेड्यूल चैक करने लगी। आज काफी काम था। शायद प्रत्युष के साथ शाम को जल्दी नहीं निकल पाएगी। उसने प्रत्युष को मैसेज कर दिया था।

12 बजे तक उसने काफी काम निपटा दिए थे। एक काम अभी भी रहता था, माँ से अभी भी बात नहीं हो पाई थी। सुबह से उसके फ़ोन के इंतज़ार में बैठी होगी। माँ और पापा दोनों ही उसके भविष्य को बुन रहे होंगे। उसके मन को जाने बिना कई योजनाएँ बना चुके होंगें। फ़ोन किया तो माँ ही थी।

"हाँ दीपाली। अगले महीने की 18 तारीख को आ जाओ। लड़के वाले आ रहे हैं। लड़का तुम्हारे लायक है। सरकारी अफसर है। चली आओ, एक बार देख लो।"

पाली का पूरा दिन व्यस्त रहा। फ़ोन, मीटिंग्स, अगले महीने होने वाली बोर्ड मीटिंग के लिए उसने डायरेक्टर से कुछ नोट्स लिए। पाँच बजे प्रत्युष का भी फ़ोन आया था पर वह रिसीव नहीं कर पाई थी, उसकी मिस कॉल देखकर उसने उसे अपने बिज़ी होने का एक मैसेज डाल दिया था। उसके इनबॉक्स में प्रत्युष के 1473 मैसेजस हैं और उसके प्रत्युष को 973 मैसेजस है। लगभग तीन सालों में इतने मैसेजस का आदान-प्रदान हुआ। सैंखड़ों बार मिले और आज भी उन दिनों में एक दिन और जुड़ने जा रहा है। माँ की बात याद आ रही थी – "एक बार चली आओ। देख लो।" उसने सोचा, "क्या चली जाऊँ! प्रत्युष से कया कहूँगी। पर वो क्यों कुछ कहेगा। मेरी शादी की बात चल रही है। उसने तो आज तक इस विषय पर कभी कुछ नहीं कहा।" दीपाली मन ही मन इन बातों को सोचती रही। "चली आओ। देख लो।" माँ के इन शब्दों पर उसे अपने जीवन के तीन साल-उसके अपने तीन साल, उसकी आत्मनिर्भरता, इस शहर का अपनापन, प्रत्युष- सब छूटते से लगे। जीवन एकसार तो नहीं होता। पंछी भी लम्बी उड़ान के बीच में पल भर को ठहरता है। वह भी एक पंछी है अपने आकाश की। उसका भी अपना जीवन है अपनी दुनिया है, पर इस खुले उन्मुक्त आकाश में कब तक उड़ेगी? ऊँचे आकाश से दिखाई देते नीचे के सुंदर दृश्य कब तक मन को बहलाएँगे? कब तक? दीपाली गंभीर मुद्रा बना अपने लैपटॉप की स्क्रीन को लगातार देख रही थी बहुत सोच-विचार के बाद उसने फैसला लिया और एक लैटर टाइप करने लगी- अगले महीने की लीव के लिए। उस लीव में 18 तारीख भी शामिल थी।


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