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05.17.2009
 

जी भर के आज जी लो
सरदार सिंह (प्रेषक : डॉ. शशि पाधा)


बहुत गुज़र चुकी है थोड़ी सी रह गई है
जितनी भी उम्र बाकी, हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है।

खूबसूरत खिजां का मौसम, और झील का किनारा
ठंडी हवा के झोंके, मौसम है कितना प्यारा
है अगर कोई जन्नत, वो जन्नत यहीं है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है।

बेशक है बाहर सरदी, धूप घर में आ रही है
यह कुदरत ख़ुदा की, मेरे मन को भा रही है
जो हुक्म है ख़ुदा का, वो सब का सब सही है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है।

हर जीव को है भाई, है ऋतु बसंत आई
फूलों में है सुगन्धि, मौसम बहार लाई
जो सुवास आ रहा है, सत्य तो वही है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो, कल की ख़बर नहीं है।

है गरमी का आज मौसम, और लू भी चल रही है
आया है खूब पसीना,  दोपहर हो रही है
मेरे जिस्म की ताकत, सब कुछ यह सह रही है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है ।


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