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06.03.2012


दीवारें

दीवारों में भी दबे छिपे कई सुराख हैं
समझो ना इन्हें बहरा इनके भी कान हैं

रोना ना इनसे कभी लिपट के तुम
कि नहीं होता है इनका भरोसा कोई
जिससे बाँटते हो दर्दे-ग़म तुम अपना समझ
सरेआम करता है वही ज़ज़्बातों को हँस-हँस
नहीं बेजान ये चारदीवारें इनमें भी जान है
इसलिए ही तो ना रखती रिश्ता अपने ग़म से
बेवफ़ा,प्यार और अपनेपन से अनजान हैं

काश ना होती ज़िंदा ये दीवारें, ना होती इनमें जान
ना कर पाती चुगली मेरे दर्द की किसी से
जो अगर होते ही ना इनके कान
स्वार्थ औ धोखे से होती कोसों दूर ये तब
दुनिया की किसी बुरी का ना होता इन्हें भान
लेकिन ये तो हैं चतुर, चालक, चौकस, चमत्कारी
दिल कहाँ इनके पास ईंट-पत्थर से बनी हैं सारी

जी में आता है झिंझोड़ कर पूछूँ इनसे मैं कि
क्यूँ हो गयी हो इतनी सख़्त और बेग़ैरत
पर जानती हूँ सुनके ये और भी खिलखिलायेंगी
ये भी ना किया तो गुस्से से भरभरा के ढह जायेंगी
जिसने इन्हें बनाया ज़ालिम चोटिल उसे ही कर जायेंगी

सुनो ’सपना’ मान सको तो मान लो मेरी ये बात
ना समझो इन दीवारों को अपना क्यूँकि इनमें भी है जान
समझो ना इन्हें बहरा क्यूँकि इनके भी होते हैं कान


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