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ISSN 2292-9754

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10.14.2016


घुटन

कब तक डर-डर के जीऊँगा
कब तक मारूँगा अपने आप को
कब तक मरी बातें सुनूँगा
लोगों की
कब तक तिल-तिल जलूँगा

कभी स्कूल में पास होने का डर
कुछ बनने का डर
कुछ न कर पाने का डर
माँ बाप के सपनो का डर
तिल-तिल मरते बचपन का डर
सच कब तक डर के जीऊँगा
कब तक मारूँगा अपने

दो जून रोटी को,
माँ -बाप के सपने को,
बच्चों की तमन्नाओं के ख़ातिर
जलती आँखों को सहता मैं
मरी मछली सी –
उसकी गंध और कर्कश आवाज़
घृणा से उसे देखती मेरी नज़र
होंठ काटते दाँत
और झूठी मुस्कान के साथ
झूठी हँसी हँसता मैं
अपनी शारीरिक ताक़त को
वश में करता मैं
पानी से भरी मेरी आँखें
डर-डर के जीने को मजबूर
एक इंसान! जी हाँ एक इंसान
जो आँखें देख डरता है
डरता किससे है?
उस आदमी से या अपने आप से, या मजबूरी से?
या उस समाज से या उस प्रथा से
जिसमे आदमी ने आदमी को ग़ुलाम बनाया
उसे महिमामंडित किया आप को


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