अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.26.2014


तेरे बरसाती वादे

सूखने न दिया
तेरे बरसाती वादों ने
सागर को उम्मीदों के
ये बात अलग के
आँखें रूखी रहीं
लब सूखे।
तू आज भी
टपकता है
मेरे पक्के संकल्पों
की मोटी छत से
और मैं हथेलियों में
भर लेने का
अक्सर करता हूँ
प्रयास
ताकि चुल्लू भर ही सही
तुम में डूब जाऊँ
भीग जाऊँ
पर तुम तो ठहरे
खुश्क नीर


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें